CNIN News Network

हिंदुस्तान को थाईलैंड से कानून व्यवस्था बनाना सीखना चाहिए!

12 Oct 2026   35 Views

हिंदुस्तान को थाईलैंड से कानून व्यवस्था  बनाना सीखना चाहिए!

Share this post with:

थाईलैंड, इस देश का नाम सुनते ही लोगों के मनोभाव बदल जाता है, मानो थाईलैंड, देश ऐसा है जहां दुनिया भर के लोग  अपनी यौन क्षुब्धा शांत करने के लिए जाते है। ऐसा नहीं है, प्राकृतिक रूप से खूबसूरती के लिए ये देश दुनिया के उन पर्यटकों के लिए महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है जहां कम बजट में विदेश घूमने की चाह पूरी होती है।इसके अलावा ये देश विरोध के तरीकों पर व्यवस्था को बनाए रखने और नागरिकों के द्वारा अपने देश के प्रति ईमानदार कर्तव्य निर्वाह के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है।

दुनिया के सभी देशो की सरकारें नागरिकों की महत्वाकांक्षा को  हमेशा पूरी नहीं कर सकती है। इसके अलावा हर काम सही करे ये भी जरूरी नहीं है।इस बात को हर देश के संविधान ने समझा है इसलिए  सरकार में विपक्ष को तो दायित्व दिया ही दिया,  संघ, संस्था संगठनों,सहित देश के हर वैध नागरिकों को  अधिकार दिया है कि वे जायज मांगो के लिए धरना, प्रदर्शन, रैली, अनशन यहां तक आमरण अनशन के संवैधानिक अधिकार का प्रयोग कर सकती है। इन सभी  के प्रयोग के लिए संविधान में अनिवार्य शर्त है। विधि विधान के साथ पालन करने की। इसका कारण है कि  विरोध करने वाले लोगों के चलते  उस स्थान विशेष के दीगर नागरिकों को किसी भी कारण से परेशानी नहीं होनी चाहिए।

हिंदुस्तान के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b): इसके तहत बिना किसी हथियार के शांतिपूर्वक एकत्र होने ,सभा करने, रैली निकालने का अधिकार प्राप्त है।

उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों (जैसे हिम्मत लाल के. शाह और अन्य मामले) के अनुसार, नागरिक सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए शांतिपूर्ण धरना दे सकते हैं। विरोध करने की सीमाएं और प्रतिबंध पूर्व से निर्धारित है।

धरने या प्रदर्शन के दौरान किसी भी तरह की हिंसा, तोड़फोड़ या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना गैरकानूनी है।  प्रशासन या पुलिस से कानून के मुताबिक पूर्व अनुमति लेना और तय स्थान का पालन करना आवश्यक होता है।

अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत देश की संप्रभुता, अखंडता, लोक-व्यवस्था या यातायात बाधित न हो, इसके लिए प्रशासन धारा 163 जैसी पाबंदियां लगा सकता है। पुलिस या प्रशासन पूरी तरह से विरोध के अधिकार को खत्म नहीं कर सकता, लेकिन नियंत्रित कर सकता है।

अब बात करते है संविधान की पुस्तक पकड़ कर बाबा साहब भीम राव अंबेडकर की कसम खाने वालों की।देश की राजधानी सहित देश के कुछ हिस्सों में कुछ पार्टियां और काकरोच जनता पार्टी निर्वाचन आयोग के ज्ञानेश कुमार को हटाए जाने के लिए नियम/ कानून की धज्जियां उड़ा रहे है।

काकरोच जनता पार्टी के प्रथम तीन शीर्ष नेता तो मानो खुद ही संविधान बन गए है। प्रदर्शन करने के अधिकार  पर कहते है दिल्ली पुलिस कौन होती है अनुमति देने वाली?

कुछ पार्टी के नेता निर्धारित मार्ग को छोड़कर मनमानी करते हुए दूसरे स्थान पर जाकर प्रदर्शन कर रहे है। बिना अनुमति के  रैली निकालने की तारीख खुद ही तय कर रहे है। ये संविधान के अनुकूल नहीं है। विरोध का कानूनी स्वरूप बदला नहीं जा सकता है, उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।ऐसा करने पर कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थानीय पुलिस प्रशासन के पास अधिकार सुरक्षित है कि वह प्रबंधात्मक कार्यवाही करने में सक्षम है।

बात थाईलैंड से शुरू हुई थी।इस देश में विरोध का कानूनी अधिकार है लेकिन नियम कानून सख्त है।जिस किसी दल या संगठन को विरोध स्वरूप धरना, प्रदर्शन, रैली अनशन आदि करना है उसे प्रशासन को लिखित सूचना देकर अनुमति लेना पड़ता है। धरने, रैली, प्रदर्शन  अनशन में भाग लेने वालों  की सूची और परिचय पत्र पहले प्रशासन के पास जमा करना होता है।उतने ही लोगों को अधिकृत अनुमति मिलती है।

इस प्रकार के कार्य से दो बाते सध जाती है।पहला,  अनाधिकृत व्यक्ति को  विरोध करने का अधिकार नहीं मिलता। दूसरा प्रशासन को  कानून और व्यवस्था में दिक्कत नहीं होती।

हिंदुस्तान में  धरना, रैली ,प्रदर्शन में सबसे ज्यादा सक्रिय असामाजिक तत्व होते है जो लूटपाट, हिंसा सहित अवसर का लाभ उठाने वाले होते है।अगर थाईलैंड जैसी कड़ाई हिंदुस्तान में भी कर दिया जाए तो  सब ठीक हो सकता है

0 संजय दुबे

Share this post with:

AD R.O. No. - 14099/21

POPULAR NEWS

© 2022 CNIN News Network. All rights reserved. Developed By Inclusion Web