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00 22 आरोपी बरी, न गवाह की पहचान, न हथियारों की जांच, न मोबाइल का फॉरेंसिक परीक्षण
बिलासपुर। बहुचर्चित संजू त्रिपाठी हत्याकांड में 22 आरोपियों के दोषमुक्त होने के बाद पुलिस की विवेचना की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो किसी भी गंभीर आपराधिक मामले की जांच व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। इस मामले में विवेचक सागर पाठक और साइबर सेल के उपनिरीक्षक प्रभाकर तिवारी की भूमिका विशेष रूप से सवालों के घेरे में है। अदालत में दिए गए उनके बयानों और जांच में सामने आई कमियों से स्पष्ट हुआ कि हत्या जैसे गंभीर मामले में कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक, तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की जांच ही नहीं कराई गई। जिस मामले में पुलिस ने हत्या की साजिश, शूटरों की भूमिका और पारिवारिक संपत्ति विवाद की पूरी कहानी पेश की थी, उसी मामले में अभियोजन उन आरोपों को अदालत में संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
सागर पाठक की विवेचना: चश्मदीद बताया, लेकिन घटना के समय मौजूद ही नहीं था!
अभियोजन ने मनोज साहू (अभियोजन साक्षी-8) को चश्मदीद गवाह बताया था। लेकिन अदालत में मनोज साहू ने कहा कि वह घटना के बाद मौके पर पहुंचा था। यानी जिस व्यक्ति को घटनास्थल का प्रत्यक्षदर्शी बताकर अभियोजन ने पेश किया, वह स्वयं घटना के समय वहां मौजूद नहीं था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विवेचक सागर पाठक (अभियोजन साक्षी-59) ने भी स्वीकार किया कि घटनास्थल पर कोई अन्य चश्मदीद गवाह नहीं मिला था। सवाल यह है कि जब घटनास्थल पर कोई दूसरा प्रत्यक्षदर्शी नहीं मिला, तो हत्या करने वाले आरोपियों की पहचान और उनकी भूमिका स्थापित करने के लिए पुलिस के पास ठोस आधार क्या था?
हथियार जब्त किए, लेकिन बैलिस्टिक जांच ही नहीं कराई!
विवेचक सागर पाठक ने अदालत में स्वीकार किया कि जब्त देशी पिस्तौलों और गोलियों को बैलिस्टिक परीक्षण के लिए नहीं भेजा गया। कोई बैलिस्टिक रिपोर्ट भी न्यायालय में पेश नहीं की गई। अदालत ने इस कमी को महत्वपूर्ण माना। किसी हथियार का गोली चलाने में सक्षम होना और उसी हथियार का हत्या में इस्तेमाल होना दो अलग-अलग तथ्य हैं। वैज्ञानिक परीक्षण के बिना दोनों के बीच संबंध स्थापित करना संभव नहीं था। हत्या में गोलियां चलीं, हथियार जब्त हुए, लेकिन उन हथियारों से ही हत्या की गई थी या नहीं, इसका वैज्ञानिक प्रमाण ही सामने नहीं आया।
श्मशान की राख से मिले धातु के टुकड़े भी जांच से वंचित!
मामले में श्मशान से बरामद धातु के छह टुकड़ों को भी फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। अदालत ने कहा कि इन टुकड़ों को मृतक पर चलाई गई गोलियों का हिस्सा नहीं माना जा सकता और न ही इनसे गोलियों की संख्या निर्धारित की जा सकती है। इतने महत्वपूर्ण साक्ष्य की वैज्ञानिक जांच नहीं कराना विवेचना की गंभीर कमी के रूप में सामने आया।
प्रभाकर तिवारी ने स्वीकार किया, रिकॉर्डिंग में आवाज की पहचान नहीं की!
कथित साजिश का एक महत्वपूर्ण आधार जय नारायण त्रिपाठी और कपिल त्रिपाठी के बीच 14 अक्टूबर 2022 की रिकॉर्डेड बातचीत को बनाया गया था। इस रिकॉर्डिंग को साजिश का सबूत बताकर अभियोजन ने अदालत में पेश किया। लेकिन साइबर सेल के उपनिरीक्षक प्रभाकर तिवारी (अभियोजन साक्षी-56) ने स्वीकार किया कि उन्हें दोनों व्यक्तियों की आवाज की पहचान नहीं थी। इतना ही नहीं, किसी भी आरोपी का वॉयस सैंपल नहीं लिया गया और न ही इसके लिए कोई अनुरोध किया गया। प्रतिलेख में नाम सकरी थाना पुलिस से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखे गए थे। यानी जिस रिकॉर्डिंग को साजिश का महत्वपूर्ण प्रमाण बनाया गया, उसमें संबंधित व्यक्तियों की आवाज की वैज्ञानिक पहचान तक नहीं कराई गई। यहां सवाल केवल साइबर जांच का नहीं, बल्कि उस कथित डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता का है, जिसके आधार पर हत्या की साजिश का आरोप खड़ा किया गया था।
मृतक का मोबाइल फोन तक जांच के लिए नहीं भेजा गया!
विवेचक ने स्वीकार किया कि मृतक का मोबाइल फोन न तो साइबर सेल भेजा गया और न ही फॉरेंसिक प्रयोगशाला। हत्या से ठीक पहले मृतक किन लोगों के संपर्क में था? किनसे बातचीत हुई? किसी संदिग्ध व्यक्ति से संपर्क था या नहीं? इन सवालों का जवाब मोबाइल फोन में मौजूद डिजिटल साक्ष्य से मिल सकता था। लेकिन पुलिस ने इस महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य की जांच ही नहीं कराई। अदालत ने भी इस बात पर सवाल उठाया कि गोलीबारी से ठीक पहले के संपर्कों की पड़ताल के लिए उपलब्ध इस स्रोत की जांच क्यों नहीं की गई।
मौत कहां और कब हुई, इसका भी पुख्ता रिकॉर्ड नहीं!
विवेचक सागर पाठक ने अदालत में कहा कि पुलिस के पहुंचने पर मृतक की मृत्यु हो चुकी प्रतीत होती थी, लेकिन उसे विशेषज्ञ परीक्षण के लिए अपोलो अस्पताल भेजा गया था। विवेचक यह निश्चित रूप से नहीं बता सके कि मृत्यु अपोलो अस्पताल में उपचार के दौरान हुई या उससे पहले।केस डायरी में अपोलो अस्पताल का बेड-हेड टिकट, चिकित्सकीय परीक्षण का रिकॉर्ड, आधिकारिक मृत्यु प्रमाणपत्र अथवा अस्पताल द्वारा मृत्यु घोषित किए जाने का दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं था। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर राहुल अग्रवाल (अभियोजन साक्षी-33) ने मृतक की छाती पर ईसीजी लीड के निशान देखे थे, जो पोस्टमार्टम से पहले कहीं और चिकित्सकीय देखभाल का संकेत देते थे। इसके बावजूद उस उपचार का पूरा रिकॉर्ड अदालत में पेश नहीं किया जा सका।
आर्म्स एक्ट में अभियोजन की पूर्व स्वीकृति भी नहीं ली!
विवेचक ने जिरह में स्वीकार किया कि आयुध अधिनियम के तहत अभियोजन चलाने के लिए जिला दंडाधिकारी यानी कलेक्टर से पूर्व स्वीकृति नहीं ली गई थी। अदालत ने कहा कि आयुध अधिनियम की धारा 39 के तहत आवश्यक पूर्व स्वीकृति के बिना संबंधित आरोप पर दोषसिद्धि नहीं हो सकती। यानी जांच के दौरान एक ऐसी वैधानिक प्रक्रिया भी पूरी नहीं की गई, जिसका सीधा असर अभियोजन पर पड़ा।
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