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जगदलपुर। राज्य शासन के निर्देश के बाद बस्तर संभाग में वर्षों से विभिन्न कार्यालयों और गैर-शैक्षणिक मलाईदार कुर्सियों पर जमे शिक्षकों और कर्मचारियों का संलग्नीकरण समाप्त कर दिया गया है। प्रशासन की इस बड़ी कार्रवाई के बाद सभी अटैच अध्यापकों को तत्काल प्रभाव से उनके मूल विद्यालयों में भेज दिया गया है। लेकिन इस सराहनीय प्रशासनिक सुधार ने बस्तर संभाग की रीढ़ मानी जाने वाली पोटा केबिन शालाओं के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है।
बस्तर संभाग के नक्सल प्रभावित और अंदरूनी इलाकों में संचालित पोटा केबिन के लिए पृथक से कोई आधिकारिक सेटअप स्वीकृत नही होने के कारण, अब इन आवासीय विद्यालयों का भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है। पोटा केबिन शालाओं की शुरुआत माओवादी हिंसा के कारण ध्वस्त हुए स्कूलों के विकल्प के रूप में की गई थी। विडंबना यह है कि स्थापना के डेढ़ दशक बाद भी शासन द्वारा पोटा केबिन के लिए कोई स्वतंत्र सेटअप पर भर्ती नहीं की गई है। अब तक यह केवल अनुदेशकों के भरोसे ही चल रहा है। नई व्यवस्था के बाद अधीक्षक भारमुक्त कर दिए गए है।
बीजापुर जिला में बासागुड़ा, तर्रेम, पीडिया, आवापल्ली, उसूर, भोपालपटनम और भैरमगढ़ के अंदरूनी क्षेत्र। सुकमा जिला में कोंटा, जगरगुंडा, दोरनापाल, छिंदगढ़ और कटेकल्याण से सटे सीमावर्ती इलाके। दंतेवाड़ा जिला में कुआकोंडा, गीदम, कटेकल्याण के संवेदनशील अंदरूनी ग्राम। नारायणपुर जिला में ओरछा (अबूझमाड़), कोहकामेटा और छोटेडोंगर के सुदूर अंचलों में पेटाकेबिन संचालित है। विदित हो कि बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर में वर्तमान में 65 से अधिक पोटा केबिन (आवासीय विद्यालय) संचालित हो रहे हैं, जिनमें लगभग 32 हजार आदिवासी बच्चे रहकर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अब तक इन शालाओं को चलाने के लिए शिक्षा विभाग दूसरे नियमित स्कूलों के शिक्षकों को पोटा केबिन में अटैच (संलग्न) करके काम चला रहा था। क्योंकि सारे अधीक्षक संलग्न शिक्षक थे, जिन्हें किसी दूसरे शाला से व्यवस्था के तहत कलेक्टर द्वारा संलग्न किया गया था।
राज्य शासन ने संलग्नीकरण समाप्त कर सभी शिक्षकों को अपने मूल स्थान पर काम करने के आदेश दिए गए हैं। तीन दिन पहले जगदलपुर में आयोजित संभागीय समीक्षा बैठक में शिक्षा मंत्री की मौजूदगी में संलग्न शिक्षकों को तत्काल वापस भेजने के निर्देश सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को दिए गए। संलग्नीकरण निरस्त होने के बाद पोटा केबिनों में तैनात शिक्षक आदेश के अनुसार अपने मूल स्कूलों में वापस लौट गए हैं। इसके चलते पोटा केबिन पूरी तरह से शिक्षक विहीन या स्थानीय स्टाफ के भरोसे रह गए हैं।
उल्लेखनिय है कि बीते वित्तीय सत्र 2025—26 में जब मुख्यमंत्री के पास शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी थी, तब इन पोटा केबिन के लिए मुख्य बजट में प्रावधान कर 900 पदों की स्वीकृति दी गई थी। जिस पर अब तक विभागीय प्रक्रिया पूरी कर भर्ती करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया। अब जब संलग्नीकरण समाप्त कर दिया गया तो इस बिंदु पर ध्यान ही नहीं रखा गया कि पोटा केबिन में पढ़ रहे आदिवासी बच्चों का क्या होगा? प्रशासन का डंडा मलाईदार कुर्सियों पर जमे लोगों को हटाने के लिए तो सही साबित हुआ है, लेकिन बिना ठोस विकल्प के इस आदेश ने बस्तर के सबसे संवेदनशील क्षेत्र के बच्चों की शिक्षा पर विपरीत असर पड़ रहा है।
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