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रायपुर। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उनकी रक्षा की कामना को लेकर माताएं कमरछठ (हलषष्ठी/हरछठ) पर बुधवार को उपवास रहेंगी और विधि-विधान से हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना करेंगी। क्योंकि इस दिन व्रत और पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम का जन्म हुआ था। भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल और मूसल माना जाता है, इसलिए इस पर्व का संबंध कृषि और हल से भी जोड़ा जाता है। कमरछठ की पूजा में सगरी का विशेष महत्व होता है। घर के आंगन या पूजा स्थल पर मिट्टी से छोटा सा तालाब या कुएं के आकार की सगरी बनाई जाती है। इसके आसपास झरबेरी, पलाश और कांसी के पौधे लगाए जाते हैं। इसके बाद कलश स्थापित कर हलषष्ठी माता की पूजा की जाती है। इस पर्व की एक खास परंपरा यह है कि व्रत के दौरान हल से जुती हुई जमीन में पैदा हुए अन्न का सेवन नहीं किया जाता। महिलाएं पसहर चावल और प्राकृतिक रूप से उगे अन्य खाद्य पदार्थों का उपयोग करती हैं। पूजा में लाई (धान का लावा), महुआ, चना, गेहूं और सतनजा सहित विभिन्न सामग्री अर्पित करने की परंपरा भी है। कई स्थानों पर भैंस के दूध-दही का उपयोग भी किया जाता है। पूजा-अर्चना के बाद महिलाएं एकत्र होकर कमरछठ व्रत की कथा सुनती हैं और हलषष्ठी माता की आरती करती हैं।
पूजा का शुभ मुहूर्त
सुबह 6:12 बजे सेषष्ठी तिथि समाप्त: 3 सितंबर 2026 को सुबह 4:25 बजे तक। प्रात:काल पूजा मुहूतर्: सुबह 6:12 बजे से 8:10 बजे तकअभिजीत मुहूर्त (दोपहर): दोपहर 12:14 बजे से 1:05 बजे तक।
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