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0- संगठन के मूल उद्देश्य, सेवा भावना और राजनीतिक अपेक्षाओं को लेकर दिया स्पष्ट संदेश
बिलासपुर। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्वयंसेवकों को संगठन के मूल उद्देश्य, सेवा भावना और राजनीतिक अपेक्षाओं को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडऩे का अर्थ भाजपा में टिकट पाने की अपेक्षा रखना नहीं है। संघ की पहचान किसी राजनीतिक पद या चुनावी लाभ से नहीं, बल्कि उसके कार्य, सेवा, व्यवहार और कर्तव्यनिष्ठा से बनती है। स्वयंसेवकों को समाज में ऐसा आचरण करना चाहिए, जिससे उनकी व्यक्तिगत पहचान के साथ संघ की प्रतिष्ठा भी बढ़े।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सरसंघचालक डॉ. भागवत ने गुरुवार शाम बिलासपुर के कोनी स्थित सरस्वती शिशु मंदिर परिसर में आयोजित बौद्धिक वर्ग में शताब्दी वर्ष में किए गए कार्यों और आदर्श स्वयंसेवक की पहचान पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवकों का दायित्व केवल संगठन से जुड़े रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के बीच अपनी विश्वसनीयता और आत्मीयता स्थापित करना भी है। उन्होंने राजनीति से दूर रहकर समाज सेवा को प्राथमिकता देने की सीख दी। कहा कि संघ की प्रतिष्ठा कार्यकर्ताओं के आचरण सेवा से बनती है इसलिए समाज में अपनी पहचान काम के दम पर स्थापित करें न की राजनीतिक पार्टी में जाने की लालसा रखें। उन्होने आगे कहा कि स्वयंसेवकों को समाज से जुडऩे का सरल लेकिन प्रभावी सूत्र देते हुए कहा कि अपरिचित व्यक्ति को परिचित बनाएं, परिचित को मित्र बनाएं और मित्र को स्वयंसेवक के रूप में जोड़ें। यह प्रक्रिया केवल संख्या बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में आपसी विश्वास, संपर्क और संगठन के प्रति आत्मीयता विकसित करने का रास्ता है।
आरएसएस के सरसंघ चालक डॉ. मोहन भागवत ने बताया कि संघ पर पहली बार अंग्रेजों ने 1930 पर प्रतिबंध लगाया था। बाद में इसे निरस्त किया गया। इसके बाद दो बार फिर प्रतिबंध लगाया गया, लेकिन हर बार संघ सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के साथ निखर कर सामने आया। उन्होंने कहा कि स्वंय सेवकों से संघ का गठन होता है। उन्होंने संगठन से कहा कि स्वालंबी बनें और निर्णय क्षमता बढ़ाएं।
श्री भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुओं का भला करने वाला संगठन है, ऐसा नहीं है। बल्कि हिंदू समाज के कारण संघ का भला होता आया है। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने जो बीज बोया है वह आज विशाल वृक्ष का रूप लेते हुए 100 वर्ष पूर्ण कर चुका है। संघ को समझने के लिए हेडगेवार को समझना जरूरी है।
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