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0- महादेव को पूजने के लिए राम नाम का महामंत्र रोज बोलना पड़ेगा
0- आज लोग धर्म को समझना भूल गए है और शरीर पर ज्यादा ध्यान देने लगे है
रायपुर। कथा में बैठने से भगवान के सामने हाजरी नहीं होती, जब तक हम कथा को अपने भीतर ना उतार लें। सती जी की कथा ने जगत के माता-पिता को सिखाया है कि व्यापार के साथ संसार में कहीं पर भी कुछ मिल जाए तो उसे स्वीकार कर लें, वह तुम्हें फांसी पर नहीं चढ़ा देंगे। लेकिन हमारा अहंकार हमें स्वीकार करने नहीं देता है, इस कारण से हम उसे स्वीकार नहीं कर पाते है। एक बार तुम इसे स्वीकार करके और आजमा कर देखो तुम्हारा भला होता है की नहीं। सतीजी ने आत्महत्या नहीं की बल्कि भगवान शंकर से मौत की कामना की थी। आत्महत्या करना बहुत बड़ा पाप है। हमारा सनातन धर्म और धर्म विज्ञान हमें क्या सिखाता है कि हमें किधर बैठना चाहिए और किधर नहीं। हम जब से कथा कर रहे है हमारे कलाकार हमेशा इधर ही बैठते है, लेकिन एक बार ऐसी घटना घटी कि जब जगतगुरु जी कथा सुन रहे थे तब उनका सिंहासन इन कलाकारों के स्थान पर था और उन्हें दूसरी तरफ बैठना पड़ा था,जिसके चलते मुझे कथा करने में बहुत परेशानी हो रही थी। स्थान बहुत बड़ी बात होती है, लोग कहते है कहीं पर भी बैठ जाओ कुछ नहीं होता है ऐसा नहीं है परेशानी होती ही है।
मैक कालेज आडिटोरियम समता कालोनी में श्रीराम कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए दूसरे दिन संत श्री शंभूशरण लाटा महाराज ने बताया कि रामकथा सुनने से जन्म-जनमांतर की व्यथा दूर हो जाती है। संसार में ऐसा कोई व्यक्ति जन्म नहीं लिया है जिसे यह संसार छोड़कर ना जाना पड़े। लेकिन अगर उस व्यक्ति को थोड़ा सा पावर मिल जाए और उसको मद (अहंकार) ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता। ऐसा ही सती जी के पिता महाराज दक्ष को हुआ था। आज आधा संसार इसी में दुखी है कि उसने ऐसा कर दिया और वैसा कर दिया, अगर हम मान लेते तो संसार दुखी नहीं होता। गोस्वामीजी कहते है कि मांगा हुआ दुख आपको छोडऩा पड़ेगा, अगर आपकी मान्यता में दुख बैठा हुआ है तो उसको अभी छोडऩा पड़ेगा, अगर उसे छोड़ दोगे तो फिर से तुम सुखी हो जाओगे।
पिता, गुरु, स्वामी और मित्र के घर में अगर कोई मंगल काम हो तो बिना पूछे या आमंत्रण के नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे विरोध पैदा होना स्वाभाविक है। अभिमान ऐसी चीज है जो कोई रिश्ता नहीं मानता है। अभिमान अगर हो जाए और बेटी भी सुख के काम में बिना बुलाए पहुंचती है तो गुस्सा होना स्वभाविक है, ऐसा ही माता सती के साथ हुआ था जब वे पिता दक्ष के ना दिए निमंत्रण पर उनके यहां चले गई थी। शिव का अर्थ कल्याण है और जिस यज्ञ में कल्याण नहीं वह यज्ञ कभी पूर्ण नहीं हो सकता है। यज्ञ होता है स्वाहा: के लिए लेकिन दक्ष ने यज्ञ किया वाह-वाह के लिए। कथा के दौरान लाटा जी महाराज ने श्रद्धालुओं से बुरा ना मानने की बात कहते हुए कहा कि आज कल कई मंदिरों और कथा स्थलों में यज्ञ होता है वहां यज्ञ नहीं वाह-वाह लूटने के लिए, यह सब ठीक नहीं है । माता साती संशय और माता पार्वती श्रद्धा के रुप में पूजी जाती है। संशय को जलना पड़ता है लेकिन श्रद्धा बनने के लिए हमारे अंदर श्रद्धा, शीतलता होना जरुरी है। जिसका हृदय शीतल होगा वहां श्रद्धा का होना स्वाभाविक है। पुराने जमाने में बेटी के जन्म होने पर उत्सव नहीं मनाया जाता था लेकिन आज के समय में अगर घर में बेटी पैदा होती है तो बड़े-धूमधाम के साथ उनका जन्मोत्सव मनाया जाता है यह अच्छी बात है।
माता जगदम्बा की पूजा करने से हमारे सारे कष्ट दूर हो जाते है और छत्तीसगढ़ तो माँ महामाया का गढ़ माना जाता है और जहां माँ खुद विराजमान हो वहां कभी संकट आ ही नहीं सकता है। इच्छित फल की प्राप्ति महादेव के आराधना के बिना नहीं होती है। कितने भी आप योग, जप और तप कर लो लेकिन महादेव के आराधना के बिना वह प्राप्त नहीं हो सकता है। संसार में किसी के पास भाग्य बदलने की क्षमता नहीं है लेकिन महादेव को सबका भाग्य पता है। लेकिन मुझे लगता है कि मेरा भाग्य जरुर बदला है क्योंकि जो कुछ भी आज हो रहा है उनकी कृपा से हो रहा है। देवताओं को पूजने में बहुत खर्च होता है लेकिन महादेव को पूजने के लिए राम नाम का महामंत्र रोज बोलना पड़ता है। आप मंदिर जाओ, जल चढ़ाओं और ऊँ नम: शिवाय बोलो लेकिन एक बार बाबा राम-राम बोलकर देखो तुम्हारे सारे दुख छूमंतर हो जाएंगे। हम भी मंत्र बहुत जानते है लेकिन पूजा करते समय एक बार जरुर बाबा राम-राम बोलते है।
करवा चौथ में पत्नी अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत करती है लेकिन अगर इसका उल्ट हो जाए तो बीमार कोई और पड़ेगा और स्वस्थ कोई और होता रहेगा। लेकिन यह नहीं होता है। भजन और भोजन आपका नहीं हो सकता है, अगर भूख लगी है तो आप ही खाओगे दूसरा नहीं खाएगा। जहां मनी होगा वहां शनि का आ स्वाभाविक है, अगर हमारे सिर शनि आएगा तो ज्यादा से ज्यादा कथा को कैंसिल कराएगा उससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता है। भजन अपने से करना पड़ता है क्योंकि भगवान के नाम में बहुत शक्ति होती है। उनका नाम लेने से ही सब पाप और कष्ट दूर हो जाते है।
हमारे बीमार पडऩे का ज्यादातर कारण यह माना जाता है कि पांच तत्वों से जो हमारा शरीर बना है चार तत्व हमारे शरीर में रह जाते है केवल एक तत्व की कमी है। हम अन्न खाते है वह पृथ्वी तत्व है, हम जल पीते है वह सीधा जाता है, सूर्य तत्व भी जाता है, वायु तत्व जिससे हम सांस लेते है वह भी जाता है लेकिन एक तत्व बाकी रह जाता है उसका नाम है आकाश तत्व। आकाश कहते है जो खाली रहता है क्योंकि कभी तो शरीर को खाली करना पड़ता है। व्रत करने से आदमी मरता नहीं है, व्रत करने से अन्न नहीं खाएंगे यह सोचना गलत है, व्रत होता नहीं है किया जाता है और अब तो व्रतधारी महिलाएं और पुरुष व्रत तोडऩे से पहले ही विविध प्रकार के पकवान बनाना शुरु कर देती है। उपवास हमारे यहां एक चिकित्सा पद्धति थी, उस समय लोग शरीर के महत्व के बारे में नहीं जानते थे और धर्म को ज्यादा, लेकिन आज समय बदल गया है लोग धर्म को समझना भूल गए है और शरीर पर ज्यादा ध्यान देने लगे है इसलिए हमें फिर से धर्म की ओर जाने की जरुरत है। व्रत करने से कुछ होता नहीं है यह कहना गलत है इससे बहुत लाभ होता है। एकादशी के दिन तुम सिर्फ जल पीकर रहकर देखो, उस दिन जल के अलावा कुछ भी ग्रहण मत करो फिर दूसरे दिन आप अपनी रिपोर्ट स्वयं देखना। एक-दो दिन बिना भोजन के रहने से कुछ बिगडऩे वाला नहीं है क्योकि उपवास में बड़ी शक्ति है और यह पहले के लोग जानते थे लेकिन आज के लोग मानते नहीं है।
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