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आज विश्व पर्यावरण दिवस है। पेड़ लगाने का महोत्सव। पेड़ लगाने का कारण प्राकृतिक है। मनुष्य की जीने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। अनेक वस्तुओं के लिए निर्भरता पेड़ पर ही है। पेड़ ही विकल्प है। कंक्रीट के जंगल के रूप मे हर गांव से लेकर शहर तेजी से विकसित रहें हैं। घर, ऑफिस, होटलों के भीतरी हिस्से को ठंडा को करने के लिए बड़ी क्षमता वाले एयर कंडीशनर दिन ब दिन बढ़ते जा रहे है। परिणाम ये है कि ग्लोबल वार्मिंग बढ़ते जा रही है। चेतना सबमे है लेकिन कोई चैत नहीं रहा है। प्रकृति के संतुलन के अपने मापदंड है। किसी न किसी तरह रास्ता बना लेंगी। एकात बड़ा भूकंप काफी है।
खैर, मनुष्य के भीतर भी ग्लोबल वार्मिंग एक बढ़ती हुई समस्या है। इस समस्या को आप जलन का भी नाम दे सकते हैं।ईर्ष्या भी कह सकते है ये प्राकृतिक नहीं सामाजिक समस्या है। दौर ये भी आ चुका है कि व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से असामाजिक होते जा रहा है। मेलजोल तभी संभव है जब सुख दुख का कोई आयोजन हो। मानवीय संबंध यांत्रिक संबंध में बदलते जा रहा है।सोशल मीडिया में सक्रिय रहनेवालों का संवाद मानवीय नहीं है बल्कि काम पर आधारित है। आप स्वयं आंकलन करेंगे तो पाएंगे कि दिनभर में किए गए कॉल में से रिश्तों के नवीनीकरण से संबंधित थे।
संबंध न होने पर भी एक समस्या दिन ब दिन बढ़ रही है मन में जलने की, ईर्ष्या करने की। भला उसकी कमीज मेरे कमीज से सफेद क्यों है? अपनी कमीज सफेद करने के बजाय दूसरे की कमीज को दागदार बनाने का खेल चल रहा है। ट्रको के पीछे लिखा हुआ है जलो मत बराबरी करो लेकिन आगे बढ़ते व्यक्ति के गुण नहीं अवगुण खोजे जा रहे है। आप किसी व्यक्ति की तारीफ किसी जगह करके देख लीजिए जलन काम कर जाएगी और जिसकी आप तारीफ कर रहे है उसके दोष गिना दिए जाएंगे। इस जलन को कम करने के लिए कितने भी पेड़ लगा दिए जाए। जलन कम नहीं होने वाली है।
विश्व पर्यावरण दिवस का दिन है।ग्लोबल वार्मिंग समस्या तो है ही, मन के भीतर बढ़ती जलन की भावना इससे कही ज्यादा खतरनाक है।
0--संजय दुबे
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