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जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मानसून से पहले जंगलों और जल संरक्षण को लेकर बड़ा अभियान चलाया जा रहा है। वन विभाग ‘वर्षा जल जहां गिरे, वहीं सहेजें’ मिशन के तहत पहाड़ी और पथरीले इलाकों में सीड बॉल तकनीक का इस्तेमाल कर हरियाली बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। साथ ही बड़ी संख्या में जल संरक्षण संरचनाएं बनाकर बारिश की हर बूंद को जमीन में सहेजने का प्रयास किया जा रहा है। इससे न केवल भूजल स्तर सुधरेगा, बल्कि वन्यजीवों और पर्यावरण को भी बड़ा लाभ मिलेगा। बस्तर के वन मंडलाधिकारी के अनुसार सीड बॉल तकनीक और जल संरक्षण संरचनाएं बस्तर के भविष्य के लिए संजीवनी साबित होंगी। इससे न केवल वनों की उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि वन्यजीवों के लिए ग्रीष्मकाल में भी पेयजल की कमी नहीं होगी।
बस्तर वनमंडल ने इस वर्ष जल संवर्धन के लिए तकनीकी रूप से सटीक लक्ष्य निर्धारित किए हैं। इसके अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है। लगभग 1.8 लाख एससीटी ये खाइयां पहाड़ी ढलानों पर बहते पानी की गति को रोककर उसे जमीन के भीतर समाहित करती हैं। 1.3 लाख लूज बॉल्डर चेकडैम (एलबीसीडी) नालों में पत्थरों के छोटे बांध बनाकर मिट्टी के कटाव को रोका जा रहा है और नमी बरकरार रखी जा रही है। बस्तर की उन दुर्गम और अत्यधिक ढलान वाली पहाड़ियों पर, जहां पारंपरिक वृक्षारोपण संभव नहीं है, विभाग सीड बॉल्स का उपयोग कर रहा है। मिट्टी और खाद के आवरण में सुरक्षित इन बीजों को मानसून की पहली बारिश के साथ पथरीले इलाकों में डाला जाएगा, जो प्राकृतिक रूप से अंकुरित होकर हरित आवरण का विस्तार करेंगे। कंटूर वुडन बंड में पहाड़ी ढलानों पर लकड़ियों को कंटूर लाइन में व्यवस्थित कर वर्षा जल और मिट्टी के कटाव को रोका जा रहा है।
बस्तर के वन मंडलाधिकारी उत्तम कुमार गुप्ता ने बताया कि विभाग का ध्यान केवल निर्माण पर नहीं बल्कि गुणवत्ता पर है। सीड बॉल तकनीक और जल संरक्षण संरचनाएं बस्तर के भविष्य के लिए संजीवनी साबित होंगी। इससे न केवल वनों की उत्पादकता बढ़ेगी, बल्कि वन्यजीवों के लिए ग्रीष्मकाल में भी पेयजल की कमी नहीं होगी। अभियान में स्थानीय वन प्रबंधन समितियों का सक्रिय सहयोग लिया जा रहा है। वन विभाग समस्त नागरिकों से कहा कि वे भी जल संरक्षण की इस मुहिम का हिस्सा बनें।
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