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* आलोक दुबे
भारतीय रंगमंच और सिनेमा के एक ऐसे मंजे हुए फ़नकार, जिनकी कला के सामने शब्द भी अक्सर ख़ामोश हो जाते हैं। नाना पाटेकर सिर्फ़ एक अभिनेता नहीं थे, वे अपने आप में एक मुकम्मल किरदार थे—अदाकारी की बुलंदी, ज़िंदगी की सादगी और इंसानियत की गहराई का ख़ूबसूरत इम्तिज़ाज।
‘अंकुश’ का वह नौजवान, जिसकी आँखों में व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश था; ‘परिंदा’ का अन्ना, जिसकी ख़ौफ़नाक ख़ामोशी भी संवाद बन जाती है; ‘प्रहार’ का वह फ़ौजी, जिसके अनुशासन में देशभक्ति और व्यवस्था पर चोट करती हुई तल्ख़ सच्चाई थी—हर किरदार में नाना ने अभिनय नहीं किया, बल्कि उसे जिया।
भारतीय काव्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र के नवरस मानो उनकी अदाकारी में साकार हो उठे—शांत से वीर, हास्य से भयानक, शृंगार से अद्भुत तक। ‘ख़ामोशी’ का ठहराव, ‘प्रहार’ का वीरत्व, ‘वेलकम’ का हास्य, ‘परिंदा’ का भय, ‘राजनीति’ की गंभीरता, ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ’ का शृंगार और ‘नटसम्राट’ का अद्भुत भाव—हर रंग में उन्होंने अपनी फ़नकारी की अलग छाप छोड़ी।
फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर रहकर उन्होंने सादगी को अपना आभूषण बनाया। शोहरत मिली, मगर सिर नहीं चढ़ी; ऊँचाई मिली, मगर ज़मीन नहीं छूटी। ज़रूरतमंदों के लिए अपने दरवाज़े खुले रखना उनके व्यक्तित्व की उस ख़ूबसूरत रौशनी का हिस्सा था, जो पर्दे की रोशनी से कहीं अधिक उजली थी।
तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, चार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार, महाराष्ट्र राज्य फ़िल्म पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेयर मराठी पुरस्कार—सम्मानों की यह फ़ेहरिस्त उनकी कला की गवाही देती है। सिनेमा में उनके योगदान के लिए 2013 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
मगर नाना की असली विरासत पुरस्कारों में नहीं, उन किरदारों में है जो दर्शकों की याद में हमेशा ज़िंदा रहेंगे। फ़न की बुलंदी और इंसानियत की सादगी का यह गठजोड़ बरसों याद रहेगा।नमन।
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