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कुछ स्वाद केवल जिह्वा को तृप्त नहीं करते, बल्कि अपनी माटी की संस्कृति, परम्परा और स्मृतियों को भी जीवित रखते हैं। छत्तीसगढ़ की पारम्परिक मिठाई पीडिय़ा इसका सजीव उदाहरण है। इसका लिखित इतिहास भले ही उपलब्ध न हो, किन्तु छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण और कुर्मी समाज की पाक-कला में इसका विशिष्ट स्थान रहा है। दोनों की विधियों में अंतर है—ब्राह्मण परम्परा में चावल का आटा, घी, शक्कर और दही, जबकि कुर्मी परम्परा में चावल के आटे के साथ मावा, घी और शक्कर का प्रयोग होता है। दीपावली आते ही पीडिय़ा की सौंधी खुशबू महकने लगती है.तमाम मिठाई व पकवान आ गए पर पीडिय़ा का छत्तीसगढिय़ा स्वाद, परम्परा का गौरव और खुशियों वाली मिठास आज भी कायम है।
पीडिय़ा का संबंध केवल स्वाद से नहीं, आस्था से भी है। राजिम के भगवान राजीव लोचन मंदिर में प्रसाद के रूप में इसका अर्पण इस मिठाई की सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।
पीडिय़ा को घरों की रसोई से व्यावसायिक बाजार तक पहुँचाने का श्रेय ब्राह्मणपारा रायपुर निवासी प्रसिद्ध कवि एवं छायाकार स्वर्गीय बसंत दीवान को दिया जाता है। इसके बाद चंगोराभाठा निवासी स्वर्गीय नीलिमा शर्मा ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। रायपुर आगमन पर स्वर्गीय सुषमा स्वराज, मेनका गांधी सहित अनेक विशिष्ट व्यक्तियों ने भी इस पारम्परिक स्वाद का आनंद लिया और सराहा भी।
नीलिमा शर्मा के निधन के बाद इस यात्रा में विराम आया, लेकिन विशु कुटीर उद्योग के संचालक आलोक दुबे ने इस परम्परा को नई दिशा दी। प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शन का कार्य छोड़कर उन्होंने छत्तीसगढ़ की पारम्परिक पाक-कला को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। भूपेश बघेल के मुख्यमंत्रित्व काल में दीपावली पर विधायकों, सांसदों और राजभवन के लिए पीडिय़ा, छीट लड्डू, चाकोली, अनरसा और खाजा जैसे पारम्परिक व्यंजन उपहारस्वरूप तैयार करने का अवसर भी विशु कुटीर उद्योग को मिला।
आलोक दुबे के सतत प्रयोग, गुणवत्ता के प्रति सजगता और पारम्परिक स्वाद के प्रति समर्पण ने पीडिय़ा को दुबई, अमेरिका और कतर जैसे देशों तक पहुँचाने में योगदान दिया। पीडिय़ा की कोमलता, विशिष्ट स्वाद और मुख में घुल जाने वाली बनावट के पीछे उनकी पाक-कला और निरन्तर साधना है।
पीडिय़ा की यह यात्रा केवल एक मिठाई की व्यावसायिक सफलता की कहानी नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और विश्व-पटल पर प्रतिष्ठित करने का प्रयास है। बसंत दीवान की पहल, नीलिमा शर्मा का योगदान और आलोक दुबे का संकल्प इस बात का उदाहरण हैं कि परम्पराएँ तभी जीवित रहती हैं, जब कोई उन्हें अपने कर्म से आगे बढ़ाता है।
पीडिय़ा में चावल के आटे, घी और शक्कर का मेल भर नहीं है; इसमें छत्तीसगढ़ की माटी की महक, पीढिय़ों का अनुभव और लोकसंस्कृति की मिठास समाहित है। पीडिय़ा मिठाई भर नहीं, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का मधुर प्रतीक है—एक ऐसा स्वाद, जिसमें परम्परा भी घुलती है और अपनी माटी का गौरव भी।
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