Share this post with:
नारायणपुर। जिला प्रशासन के स्कूल केइंता मिशन के तहत अब तक दो हजार से अधिक बच्चों को स्कूलों और छात्रावासों से जोड़ा जा चुका है। नक्सल प्रभावित रहे नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के इस सुदूर गांव कोहकापार में प्राथमिक विद्यालय की शुरुआत इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक मानी जा रही है। जहां शिक्षा ने पहली दस्तक दी, जहां आज तक किसी बच्चे ने स्कूल की घंटी नहीं सुनी थी। पहली बार गांव में पाठशाला खुली, घंटी बजी और नन्हे हाथों में किताबें थमाईं गईं। नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने आज शनिवार को विद्यालय के पहले दिन 21 बच्चों, 11 छात्राओं और 10 छात्रों का मुकुट पहनाकर स्वागत किया। उन्हें किताबें दीं और फिर घोटूल में बैठकर स्वयं बच्चों को पढ़ाया।
बस्तर में कभी माओवादी हिंसा के चलते 458 स्कूल बंद कर दिए गए थे, जिससे हजारों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया था। अब स्थिति सामान्य होने पर सरकार ने 421 से अधिक स्कूलों को पुनर्जीवित कर दिया है। जिस अबूझमाड़ के जंगलों में कभी माओवादी अपनी स्कूलÓ चलाकर हथियार चलाने का प्रशिक्षण देते थे, वहां अब सरकारी स्कूल खुल रहे हैं। यह परिवर्तन स्पष्ट संकेत है कि क्षेत्र अब हिंसा के बजाय विकास एवं शिक्षा की ओर बढ़ रहा है।
नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ जैसे क्षेत्रों में स्कूलों का खुलना केवल साक्षरता अभियान नहीं, बल्कि एक बड़ा मनोवैज्ञानिक परिवर्तन है। शिक्षा का प्रसार नक्सलवाद की वैचारिक जड़ को कमजोर करता है, क्योंकि यह युवाओं को वैकल्पिक भविष्य और अवसर प्रदान करता है। जब बच्चा स्कूल जाता है, तो वह केवल पढऩा नहीं सीखता, बल्कि वह राज्य की मशीनरी और संवैधानिक अधिकारों से परिचित होता है। यह एक 'डेमोक्रेटिक स्पेसÓ बनाता है जो माओवादी एकाधिकार को चुनौती देता है। शिक्षा से आने वाली जागरूकता ही लंबे समय में हिंसा को कम करने और स्थायी शांति लाने का सबसे प्रभावी और टिकाऊ माध्यम सिद्ध होगी।
Share this post with:
18 Jul 2026 14 Views
18 Jul 2026 16 Views
18 Jul 2026 27 Views
18 Jul 2026 37 Views
18 Jul 2026 95 Views
17 Jul 2026 9 Views
17 Jul 2026 18 Views