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दंतेवाड़ा। बस्तर दशहरा में शामिल होने अष्टमी तिथी में जगदलपुर रवाना हुई माता मावली की डोली एवं मां दंतेश्वरी के छत्र मंगलवार देर रात दंतेवाड़ा पहुंच गई। आंवराभाटा स्थित डेरे में रात्रि विश्राम के बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद पुलिस जवानों ने माता की छत्र-डोली को गॉड ऑफ ऑनर दिया। पारंपरिक नाच-गान, ढोल-नगाड़ों और माता के जयकारों के बीच श्रद्धालु छत्र-डोली को पैदल लेकर नगर की ओर रवाना हुए। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने माता का स्वागत और अगवानी की। पूरा नगर भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया।
मां दंतेश्वरी की यह वापसी केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि दंतेवाड़ा की सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के निर्वहन का महत्वपूर्ण अवसर है। बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए जगदलपुर गईं माता मावली की डोली एवं मां दंओश्वरी के छत्र की वापसी पर नगरवासियों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ स्वागत किया। नगर प्रवेश के दौरान मां दंतेश्वरी की छत्र-डोली जय स्तंभ चौक स्थित बाबा बोधराज के दरबार पहुंची, जहां विशेष पूजा-अर्चना के साथ पारंपरिक रस्म निभाई गई। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बाबा बोधराज को दंतेवाड़ा नगर का संरक्षक और प्रमुख क्षेत्रपाल देवता माना जाता है। यही वजह है कि माता की वापसी के दौरान उनके दरबार में हाजिरी लगाने की परंपरा का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि जब मां दंतेश्वरी बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए जगदलपुर रवाना होती हैं, तब नगर की सुरक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी बाबा बोधराज तथा नगर कोतवाल घाट भैरव बाबा को सौंपी जाती है। माता की अनुपस्थिति में इन देवताओं को नगर का रक्षक मानकर पूजा-अर्चना की जाती है। माता की वापसी पर उनके दरबार में पहुंचकर परंपरा का निर्वहन किया जाता है।
दंतेवाड़ा की इस विशिष्ट परंपरा में बाबा बोधराज के दरबार में पूजा-अर्चना के बाद मां दंतेश्वरी को मंदिर में प्रवेश कराने की अनुमति लेने की रस्म निभाई जाती है। परंपरा के अनुसार, पुजारी विधि-विधान से पूजा संपन्न कराते हैं। इस दौरान सफेद मुर्गा भेंट करने की रस्म भी निभाई जाती है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, बाबा बोधराज के दरबार में अनुमति की रस्म पूरी होने के बाद ही माता की छत्र-डोली को मंदिर में प्रवेश कराया जाता है। यह परंपरा नगर की रक्षा और व्यवस्था की जिम्मेदारी सौंपने तथा माता की वापसी पर परंपरागत धार्मिक विधान को पूरा करने का प्रतीक मानी जाती है। पीढिय़ों से चली आ रही इन परंपराओं के माध्यम से क्षेत्र की धार्मिक मान्यताएं और लोकसंस्कृति आज भी जीवंत बनी हुई है।
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