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रायपुर। देश के दूर दराज वंचित ग्रामीण समुदायों, महिलाओं और किशोरियों के सामाजिक विकास को मजबूत बनाने की दिशा में काम करने वाले गैर-लाभकारी संगठन चरखा डेवलपमेंट कम्युनिकेशन नेटवर्क ने संजॉय घोष ग्रासरूट्स लीडरशिप अवार्ड्स 2026 के विजेताओं की घोषणा कर दी है। इस वर्ष छत्तीसगढ़ के धीरज, उत्तर प्रदेश की रूपा सिंह और राजस्थान की संतरा चौरठिया को 7 दिसंबर, 2026 को नई दिल्ली स्थित एलायंस फ्रांसेज में आयोजित चरखा के 32 वें स्थापना दिवस समारोह में सम्मानित किया जाएगा। इनका चयन तीन सदस्यों की एक स्वतंत्र जूरी ने किया है। पुरस्कार के लिए देशभर से कुल 81 आवेदन प्राप्त हुए थे। इसके तहत प्रत्येक विजेताओं को एक प्रशस्ति पत्र और 25,000 की नकद राशि प्रदान की जाएगी।
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में बचपन बनाओ संस्था के साथ काम कर रहे धीरज, युवा विकास एवं नेतृत्व, जेंडर और यौनिकता, शिक्षा तथा उच्च शिक्षा तक पहुंच, आदिवासी युवाओं के विकास और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय हैं। इसके साथ ही वे फेलोशिप और क्षमता निर्माण से जुड़े कार्यों में भी योगदान दे रहे हैं। धीरज स्वयं को एक नारीवादी सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचानते हैं और उन्हें सामाजिक क्षेत्र में छह वर्षों से अधिक का अनुभव है। उनकी विशेष रुचि युवाओं और हाशिये पर रहने वाली जेंडर पहचानों से जुड़े लोगों के मुद्दों पर काम करने तथा उनके अधिकारों और विकास को बढ़ावा देने में है।
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के पूरना गांव की निवासी रूपा सिंह, विज्ञान फाउंडेशन के साथ काम करते हुए स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को संगठित करने और उन्हें अपने अधिकारों, शिक्षा तथा लैंगिक हिंसा के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अपने जीवन के अनुभवों को सामाजिक बदलाव की पहल में बदलने वाली रूपा आज भी अपने क्षेत्र की महिलाओं के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रही हैं। उनका उद्देश्य ऐसे समाज का निर्माण करना है, जहां हर महिला सम्मान के साथ जी सके, अपने फैसले स्वयं ले सके और बराबरी के साथ आगे बढ़ सके।
राजस्थान के अजमेर की रहने वाली संतरा चौरठिया वर्ष 2021 से सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय हैं और डॉक्यूमेंट्री फिल्म, फोटोग्राफी और मीडिया के जरिए समुदायों की कहानियां सामने ला रही हैं। उनके लिए फिल्में और कहानियां सिर्फ अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उन आवाजों तक पहुंचने का माध्यम भी हैं, जिन्हें अक्सर सुना नहीं जाता। 'सिटीज फॉर यूथÓ के तहत उन्होंने लड़कियों की सुरक्षा पर 'अजमेर की लड़कियां कहां हैंÓ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसका अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन हुआ। वर्तमान में संतरा, टेक सेंटर में लड़कियों को डिजिटल कौशल सिखा रही हैं और फिल्म, लेखन तथा कहानी कहने के जरिए सामाजिक मुद्दों पर नए संवाद की जगह बना रही हैं।
विजेताओं का चयन तीन सदस्यों वाली एक स्वतंत्र जूरी ने किया। जिसमें मीनाक्षी सान्याल उर्फ मालोबिका जो एक क्वियर नारीवादी कार्यकर्ता और कोलकाता स्थित सैफो फॉर इक्वैलिटी की सह-संस्थापक हैं और दो दशकों से अधिक समय से भारत के एलजीबीटीक्यूआई+ आंदोलन से जुड़ी हैं। जबकि सितारा बानो पिछले कई दशकों से राजस्थान में सामाजिक कार्य और सामुदायिक विकास के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वहीं एक अन्य ज्यूरी प्रार्थना ठाकुर निरंतर ट्रस्ट के युवा शिक्षा कार्यक्रम में वरिष्ठ फैसिलिटेटर के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समावेशन, लैंगिक समानता, पाठ्यक्रम विकास और शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में 16 वर्षों का अनुभव है।
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