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०- आजकल ईर्ष्या में लगभग लोग जल रहे हैं, यह बहुत बड़ा दोष है
०- जीवन में कितनी भी परेशानी आ जाए, भगवत नाम कभी न भूलें
रायपुर। भागवताचार्य इन्द्रेश जी महाराज ने बताया कि आजकल ईर्ष्या में लगभग लोग जल रहे हैं। यह बहुत बड़ा दोष है। दूसरे की सादगी, खुशी, सुखी, भलाई देखी नहीं जाती। आजकल तो लोग इसलिए दुखी है कि हम जैसा चाह रहे थे वैसा दुखी नहीं हैं। जीवन में टेढ़े दिन आ जाए पर ध्यान रखना भक्ति में टेढ़े दिन नहीं आना चाहिए। ठाकुर जी के प्रति प्रेम न टूटे। भगवत कृति-भगवत का नाम का कभी त्याग नहीं करना। छतरी की तरह है भगवत नाम, चाहे जीवन में कितनी भी परेशानी आ जाए, परिस्थितियां बदल जाए, संघर्ष करना पड़े, संकट आ जाए, पीड़ा झेलनी पड़े, कष्ट झेलना पड़े। जिस हरिरूपी नाम से चारो तरफ से घिरे हैं और यही आपकी रक्षा करेंगे। कष्ट आने पर दोनों भुजाएं ऊपर उठाकर पूरी ताकत से भगवत नाम लीजिए। इन परिस्थितियों को ये बता देना कि वो भी कांप जाए, बता दो आओगे तो सोंच समझकर हमारे पास आना क्योकि हम जगन्नाथ के दास हैं। कृषि मंडी देवेन्द्रनगर में श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन श्री इन्द्रेश जी महाराज ने वामन द्वादशी पर वामन अवतार की कथा प्रसंग को वर्णित किया।
प्रभु के लिए विरह सबको नहीं आता है..
भागवताचार्य इन्द्रेश जी महाराज ने विरह और प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा कि व्यक्ति को जब किसी से प्रेम होता है तो उससे मिलने या देखने के लिए सौ बहाने बनाते हैं, नहीं होता है तो छोटी सी बीमारी को भी बड़ी बता देते हैं। हाड़- मांस से बने लोगों के लिए जब हो सकता है तो क्या ठाकुर जी के लिए नहीं हो सकता। संसारी सुख को आशक्ति कहते हैं यह ज्यादा दिन तक टिकते नहीं हैं। प्रेम की व्याकुलता तो मीराबाई की तरह होनी चाहिए। विरह तो वृत्तासुर की तरह होना चाहिए.जो स्वंय ठाकुरजी से मांग रहे हैं। हर किसी के नेत्र सजल नहीं होते हैं।
छल कपट झूठ जैसे अवगुणों से किसी के साथ गलत किया है तो केवल क्षमा मांग लेने से काम नहीं चलेगा। गलत करने से इंसानियत का स्वरूप ओझल हो जाता है। अवगुण आने से इंसानियत जाने लगते हैं। छल कपट झूठ का प्रायश्चित्त करना चाहतें तो केवल गलती स्वीकारने या क्षमा मांगने से काम नहीं चलेगा, आगे से फिर कभी नहीं होगा ये प्रण लेकर इसे ठाकुरजी के चरणों में तिलाजंलि दे दो।
आज तिलक-जटाधारी वेष में घूम रहे रावणरूपी लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। किसी भी तिलकधारी से संबंध न बना लें। उनके अंदर के स्वभाव को पहचान पाना मुश्किल होता है, हर किसी में साधुता नहीं होती। ऐसे लोगों को वंदन प्रणाम करने से पता चल जाता है। आगे एक अन्य प्रसंगवश कश्यप ऋषि का वृतांत पर बताया कि संध्याकाल में कुछ चीजों का वर्जन है इसे जान लेना जरूरी है। जैसे भोजन नहीं करना चाहिए इससे रोग आता है। पढऩा नहीं चाहिए विस्मृति आती है। सोना नहीं चाहिए घर में दरिद्रता आती है। गर्भधारण की प्रक्रिया में नहीं जाना चाहिए।
स्वर्ण वेष में थे आज जगन्नाथ प्रभु
श्री इन्द्रेश जी महाराज ने कथा के प्रारंभ दिवस पर जैसे की बताया था भगवान जगन्नाथ प्रभु, सुभद्रा जी और बलभद्र जी, सुदर्शन जी के पोशाक रोज बदले जाएंगे और श्रद्धालुओं को दिव्य दर्शन होंगे। कथा स्थल पर आज स्वर्ण वेष में बहुत सुंदर स्वरुप में विराजमान थे। जब रथयात्रा के बाद लौटकर प्रभु आते हैं तो इसी वेष में रहते हैं।
कौशल्या देवी साय पहुंची कथा श्रवण करने
कृषि मंडी देवेन्द्रनगर श्रीमद्भागवत कथा में आज कथा श्रवण करने के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की धर्मपत्नी कौशल्या देवी साय व महापौर श्रीमती मीनल चौबे कथा श्रवण करने पहुंची। सेवादार गुंजन प्रजापति व समिति के सदस्यों ने उनका स्वागत किया।
बारिश से भी कम नहीं उत्साह...
कथा के तीसरे दिन दोपहर में अचानक हुई तेज बारिश के बाद भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। चूंकि पंडाल वाटर प्रुफ था इसलिए असुविधा नहीं हुई और श्रद्धालुओं ने नियत समय पर अपनी जगह बना ली। आयोजन समिति की ओर से सेवादार गुंजन प्रजापति ने श्रद्धालुओं को इस सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। व्यासपीठ ने भी हजारों श्रद्धालुओं को आशीष दिया। इन्द्रेश जी महाराज ने कहा कि आज परीक्षा की घड़ी थी भक्तों की,लेकिन वे महाप्रभु से प्रेम करते हैं इसलिए कथा में आ गए। वर्षा के बिंदु के रुप में आज तो भगवान जन भी कथा श्रवण करने आए हैं। तूफान-आंधियों में..तैयार तो हरदम हैं हम..जबस तुम्हारे पुकारा है..।
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