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चले गए व्यवस्था पर प्रहार करने वाले नाना पाटेकर

08 Oct 2026   22 Views

चले गए व्यवस्था पर प्रहार करने वाले नाना पाटेकर

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* संजय दुबे

भारतीय फिल्मों में दो प्रकार की विचारधारा साथ साथ रेंगी, चली, दौड़ी और रुकी भी। इन दो श्रेणी को मनोरंजन और समांतर फिल्मों का नाम दिया गया। समांतर फिल्मों में फैंटेसी की कोई जगह नहीं हुआ करती थी जैसा सच है वैसा  परोस दिया जाता है। इस श्रेणी के फिल्म बनाने वालों और इनमें अभिनय करने वालों की बिरादरी  अलग ही हुआ करती है। समांतर फिल्मों को सार्थक फिल्म भी माना जाता है।ऐसे  फिल्मों के सहारे अभिनय की भूख तो मिट जाती है लेकिन पेट की क्षुब्धा बरकरार रहती है।इसके चलते समांतर फिल्म वाले मनोरजंन वाली फिल्मे करते है। नाना पाटेकर भी इस श्रेणी में शामिल हुए लेकिन जिस प्रकार नसीरुद्दीन शाह,ओम पुरी दोनों प्रकार की फिल्मों में तालमेल बैठा पाए वैसा नाना पाटेकर नहीं बैठा पाए।इसका कारण भी था वह था नाना का खुद का स्वभाव। जमीन से उठने वाले कलाकार स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं करते इसके अलावा अपनी शर्तों पर काम करते है।ये रवैया मनोरंजन परोसने वाले स्थापित निर्माता निर्देशकों  सहित खुद को सुपर स्टार  मानने वाले व्यवसायिक कलाकारों को नहीं भाता है।इसी कारण नाना। पाटेकर के साथ ऐसे कलाकारों ने कभी भी फिल्मों में काम नहीं किया। कलाकारों में केवल नायक ही नहीं बल्कि नायिकाएं भी शामिल थी।नाना पाटेकर को इस बात की कोई शिकायत हो भी नहीं थी क्योंकि उनके भीतर के अभिनेता के लिए पर्याप्त फिल्मे मिल चुकी थी। पैसे की भूख उन्हें रही नहीं। वे विलासिता के बजाय संतोष के  साध्य थे इस कारण मुंबई के चकाचौंध से दूर अपने  पैतृक गांव में रहकर खेती करना मुनासिब समझा।

गजब संयोग जिस दिन राजकुमार जन्म लिए उसी दिन नाना पाटेकर मर गए।
गजब संयोग जिस दिन राजकुमार जन्म लिए उसी दिन नाना पाटेकर मर गए।

एक  अभिनेता के रूप में उनका अभिनय अलग ही दर्जे का था व्यवस्था से लड़ाई के लिए सशक्त विरोध  के रूप में प्रतीक बने। नायक बने सहनायक बने और खलनायक बनने में भी गुरेज नहीं किया ।"अग्निसाक्षी" फिल्म इस बात का उदाहरण है।    बतौर अभिनेता के रूप में नाना पाटेकर ने 1978 में गमन फिल्म से शुरुआत की थी।क्रांतिवीर, परिंदा, प्रहार अब तक छप्पन,खामोशी, तिरंगा राजनीति उनकी बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। मराठी भाषा में बनी नट सम्राट उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय की फिल्म है।

प्रहार उनके निर्देशन में बनी अच्छी फिल्म है जिसका ये संवाद  पता नहीं देश के राजनीतिज्ञों को क्यों नहीं भाती कि" इस देश के हर नागरिक को कम से कम दो साल सेना को देना अनिवार्य होना चाहिए।"। कम से कम जीवन में अनुशासन सीख पाते।

75 साल की उम्र में  अलग ही प्रकार के संवाद अदायगी वाले नाना पाटेकर अपनी  ही अभिनीत फिल्म खामोशी  के समान आज खामोश हो गए।पंचतत्व में विलीन हो गए।

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