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00 भय से जीव भगवान की भक्ति करता है और जिसके अंदर भय नहीं है उसका नाश हो गया
00 जिसने बचपन में भक्ति नहीं की, वह बुढ़ापे में कभी भक्ति नहीं कर सकता
रायपुर। गलती मान लेने से आपके पाप धुल जाते है लेकिन आज का प्राणी गलत मानने को तैयार ही नहीं होता है। भय से जीव भगवान की भक्ति करता है और जिसके अंदर भय नहीं है उस जीव का नाश हो गया। जिसने बचपन में भक्ति नहीं की, वह बुढ़ापे में कभी भक्ति नहीं कर सकता। श्री राम कथा तो गंगा है, उसमें समाहित होकर तो देखो। भगवान से डर लोगे ना तो किसी और से डरने की आवश्यकता नहीं है। आज का समय तो छप्पन भोग वाला है। यदि प्रेम नहीं हैं तो क्या भगवान छप्पन भोग स्वीकारेंगे।
मैक कॉलेज ऑडिटोरियम समता कालोनी में जीवन दर्शन को श्रीराम कथा से जोड़कर कई सारगर्भित बातें आज संत शंभूशरण लाटा महाराज ने बतायी। उन्होने बताया कि आज लोग अपनी गलती भी नहीं स्वीकारते हैं। देवी अहिल्या ने अपनी गलती स्वीकार किया था इसलिए भगवान राम ने उनका उद्धार किया। पाप और पुण्य दोनों छिपाने से बढ़ते है और सामने कर दो तो घटते है। हम काम कितना करते है, भजन कितना करते है सबको बताते है, लेकिन हमने पाप कितना किया है वह भगवान से कभी छिपा नहीं सकते है लेकिन हमारा बस चले तो हम भगवान को भी पता नहीं लगने दें। स्वीकार करना मुश्किल नहीं है लेकिन हमारा स्वीकारना मुश्किल है। कोई चूक, भूल या गलती हो जाए तो उसका हिसाब करते रहें क्योंकि छोटे-छोटे पाप हमसे हमेशा होते रहते है और छोटे पाप का छोटा प्रायश्चित होता है। पहले जब किसी गांव में चीटी मर जाती थी तो लोग खड़े होकर राम-राम कहतेे थे और यही छोटा प्रायश्चित होता था उन लोगों का क्योकि भगवान के नाम में बहुत शक्ति है।
लाटा महाराज ने बताया कि राम कथा तो गंगा है क्योंकि जब पुराने लोग स्नान करते थे तो बोलते थे हर-हर गंगे लेकिन आज-कल यह परंपरा छुटने लगी है । क्या लगता है जब आप नहाते समय दो-तीन बार हर-हर गंगे का स्मरण कर लो आपके पाप कटने लग जाते है। गंगा में स्नान करने से पाप और कष्ट मिट जाते है। वैसे ही श्रीराम कथा में सच्चे मन से गोते लगा लो आपके दुख दूर हो जायेंगे। हर प्राणी को अपना प्राण जरुर प्रिय लगता है क्योंकि हर प्राणी में राम बसते है। कोई किसी के मन की बात जान सकता है इसमें कोई ज्यादा सीखने की आवश्यकता नहीं है एक ओर सत्य रहे और दूसरी ओर समर्पण । इसलिए तो भगवान राम भाई लक्ष्मण की बात जान गए थे कि वे जनकपुर को देखना चाहते है। पहले पति पूर्ण सत्य होता था और पत्नी में पूर्ण समर्पण, पति को बोलना नही पड़ता था। गुरु में सत्य होता था और शिष्य में समर्पण और वे बिना बोले मन की बात जान लेते थे। बचपन में की गई भक्ति सफल होती है, अगर बचपन में भक्ति नही हुई तो शायद अभी कर लो, लेकिन इस भरोसे में मत रहना कि बुढ़ापे में भक्ति करेंगे। जिसने बचपन में नहीं की वह बुढ़ापे में कभी भक्ति नहीं कर सकता है। जिसने बपचन में किया तो उसका बुढ़ापा अच्छा बीत जाएगा। बूढ़े लोगों का समय भजन का है लेकिन वे परिवार के प्रपंच में लगे रहते हैं। भजन आपके स्वभाव को सुधार देता है।
शंभूशरण लाटा महाराज ने श्रद्धालुओ से कहा कि भय से जीव भगवान की भक्ति करता है और जिसके अंदर भय नहीं है उस जीव का नाश हो गया । जिसका वारिस नहीं वो लावारिश है, डर हमारा वारिश है, डर हमारा सदगुरु है इसलिए थोड़ा सा डरना सीखो। आज जितने भी एक्सिडेंट होते है वो सब निडर लोग करते है। आपने कम सुना होगा कि कोई अंधा आदमी सड़क पार कर रहा होगा और उसका एक्सिडेंट हो गया होगा क्योंकि वह डर-डर चलता है, चलाने वाले को सावधान होना पड़ता है। जिन से डरना चाहिए उनसे लोग डरते नहीं है, जिन से नहीं डरना चाहिए उनसे डरते है। शनि, मंगल, राहु लग गया है ये क्या बिगाडेगे तुम्हारा, अगर आप भगवान से डर लोगे ना तो किसी से डरने की आवश्यकता नहीं हैं। आज का जीवन बनावट, सजावट व दिखावे का है। प्रेम होना चाहिए लेकिन आज का समय तो छप्पन भोग वाला है। यदि प्रेम नहीं हैं तो क्या भगवान छप्पन भोग स्वीकारेंगे। हालांकि बात कड़वी जरूर लग सकती है पर सच्चाई यही है।
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