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00 किसानों को दिए जा रहे वैज्ञानिक खेती के सुझाव
00 प्रधानमंत्री आशा योजना के अंतर्गत दलहन एवं तिलहन फसलों को बढ़ावा
रायपुर। खरीफ मौसम 2026 के दौरान संभावित अल्प एवं अनियमित वर्षा की स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कृषि विभाग द्वारा आकस्मिक कार्ययोजना तैयार कर किसानों के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
उप संचालक कृषि ने बताया कि कम वर्षा की स्थिति में किसानों को संरक्षण जुताई अपनाने की सलाह दी जा रही है। इस तकनीक से मिट्टी की संरचना एवं नमी संरक्षित रहती है, कार्बनिक पदार्थों का संरक्षण होता है तथा भूमि की जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है। उन्होंने बताया कि किसानों को अपनी भूमि की प्रकृति एवं वर्षा की स्थिति के अनुरूप फसलों का चयन करने, सूखा प्रतिरोधी एवं कम अवधि में पकने वाली उन्नत किस्मों का उपयोग करने तथा डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) पद्धति अपनाने की सलाह दी जा रही है। डीएसआर तकनीक से धान की रोपाई की आवश्यकता नहीं होती तथा 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत संभव है।
कृषि विभाग ने हल्की भूमि में तिल, रामतिल एवं मूंगफली तथा भारी भूमि में शीघ्र एवं मध्यम अवधि की धान की किस्मों के साथ ऊपरी भूमि में मूंग, उड़द एवं अरहर की जल्द पकने वाली किस्मों की खेती करने की सलाह दी है। इसके साथ ही कतार पद्धति से बुवाई, मिश्रित खेती तथा बुवाई के समय गोबर खाद अथवा जैविक खाद के उपयोग पर भी विशेष जोर दिया गया है, जिससे कम वर्षा की स्थिति में भी फसलों का बेहतर विकास हो सके।

वैकल्पिक फसलों की व्यवस्था
उप संचालक कृषि ने बताया कि कम वर्षा की स्थिति में किसानों को कम अवधि एवं कम पानी में तैयार होने वाली वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सलाह दी जा रही है। इनमें बाजरा, ज्वार, मक्का, मूंग (के-851, पूसा विशाल, बी.एम.-4, एच.यू.एम.-12. विराट), उड़द (टी-9, पंत यू-30, बरखा, गौतम, टी.यू.-94-2), उड़द, अरहर, तिल, मूंगफली, तोरिया तथा रागी, कोदो एवं कुटकी जैसे मिलेट शामिल हैं। ये फसले अत्यधिक सूखा सहन कर सकती है और कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है। इन फसलों को पारंपरिक फसलों की तुलना में बहुत कम सिंचाई की आवश्यकता है। ये फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती हैं तथा 60 से 80 दिनों में तैयार हो जाती हैं। साथ ही प्रधानमंत्री आशा योजना के अंतर्गत दलहन एवं तिलहन फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी होने से किसानों को उचित मूल्य भी प्राप्त होगा।
जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए विभाग ने नालों पर अस्थायी कच्चे बांध निर्माण, खेतों में आवश्यकतानुसार सिंचाई, टपक एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के उपयोग, हाथ से निराई, खेत तालाब निर्माण, ढलान के आड़े जुताई, मल्चिंग तकनीक, कंटूर ट्रेंच, एलबीसीडी, गेबियन संरचनाओं तथा डबरी एवं स्टॉप डेम निर्माण जैसे उपाय अपनाने की सलाह दी है। इन उपायों से वर्षा जल का संरक्षण, भू-जल स्तर में वृद्धि, मृदा कटाव की रोकथाम तथा संकट की स्थिति में जीवनरक्षक सिंचाई सुनिश्चित की जा सकेगी।
कृषि विभाग ने कोंडागांव जिले के किसानों से अपील की है कि वे मौसम की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विभाग द्वारा सुझाई गई वैज्ञानिक कृषि तकनीकों एवं जल संरक्षण उपायों को अपनाएं, ताकि कम वर्षा की स्थिति में भी फसल उत्पादन एवं आय पर प्रतिकूल प्रभाव को न्यूनतम किया जा सके।
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