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लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का अधिकार है, लेकिन जब प्रदर्शन हिंसा में बदल जाए, सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर, बोतलें और अन्य वस्तुएं बरसाई जाएं और कानून व्यवस्था संभाल रहे पुलिसकर्मी लहूलुहान हो जाएं, तब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर उनकी पीड़ा की आवाज कौन उठाएगा? 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के 'चलो संसद' मार्च के दौरान घायल हुए दिल्ली पुलिस के जवानों के परिजनों और दिल्ली पुलिस महासंघ ने एक साझा संदेश दिया कि संसद और देश में केवल प्रदर्शनकारियों की चोटों की नहीं, बल्कि ड्यूटी निभाते हुए घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा पर भी चर्चा होनी चाहिए। हर वर्दी के पीछे केवल एक पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि उसका पूरा परिवार होता है, जिसकी चिंता और पीड़ा अक्सर सार्वजनिक बहस से गायब रहती है।
दिल्ली पुलिस महासंघ ने सबसे बड़ा सवाल यह भी उठाया है कि यदि पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर हमला करने के आरोप लगाए जा रहे हैं, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि हिंसा के दौरान घायल हुए 128 पुलिसकर्मियों पर हमला किसने किया? आखिर उन जवानों के खून का जिम्मेदार कौन है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और संसद की सुरक्षा के लिए ड्यूटी पर तैनात थे? लोकतंत्र तभी संतुलित माना जाएगा, जब प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ-साथ कानून की रक्षा में खड़े पुलिसकर्मियों के सम्मान, सुरक्षा और बलिदान को भी समान संवेदनशीलता और गंभीरता से देखा जाएगा।
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