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* संजय दुबे
कहा जाता है कि एक फोटो हजार शब्द के बराबर होता है।1960 के दशक ब्लैक एंड व्हाइट का युग था। फोटो भी ऐसे ही हुआ करती थी। रघु राय की आंखों के देखने का अंदाज जुदा था। उनकी खींची फोटो में सारे रस दिखा करते थे।इसके चलते वे सामान्य से विशिष्ट फोटोग्राफर बने। महत्वपूर्ण घटनाओं के वे साक्षी बने तो पूरे देश ने उनकी आंखों से घटनाओं को देखा।ब्लैक एंड व्हाइट के युग से कलरफुल फोटोग्राफी का दौर आया तो रघु की खींची तस्वीरें और भी सजीव हो गई।
रघु राय ने द स्टेटमेंट में काम किया।इंडिया टुडे के लिए उनके कैमरे ने महत्वपूर्ण दृश्यों को कैद किया। मालिकों से जी भर गया तो वे फ्री लांसर फोटोग्राफर हो गए। आजादी की आँखें शायद ज्यादा देख सकने की जिजीविषा ने रघु राय को और भी बड़ा बना दिया।
जीवन मरण के बीच के सफर में रघु राय का कैमरा दृश्यों को अपने भीतर समेटते गया। आज रघु राय के जीवन के कैमरे का शटर स्थाई रूप से बंद हो गया। रघु राय, विस्मृत करने वाले व्यक्तित्व नहीं है।श्रद्धांजलि
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