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काछन देवी व रैला देवी से बस्तर दशहरा के निर्विघ्न संपन्नता का मिला आशिर्वाद

11 Oct 2026   6 Views

काछन देवी व रैला देवी से बस्तर दशहरा के निर्विघ्न संपन्नता का मिला आशिर्वाद

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जगदलपुर। रियासत कालीन बस्तर दशहरा पर्व का महत्वपूर्ण पूजा विधान काछनगादी पूजा 10 अक्टूबर की देर शाम को सम्पन्न हुआ, लगभग 11 वर्षीय बालिका पीहू दास पर काछन देवी सवार होने के बाद बेल कांटे के झूले में आरूण होकर बस्तर राज परिवार के सदस्य को निर्विघ्न बस्तर दशहरा पर्व संपन्नता का आशिर्वाद प्रदान किया। इसके बाद गोलबाजार में रैला देवी के स्वरूप में बालिका गुनगुन ने निर्विघ्न बस्तर दशहरा पर्व की संपन्नता का आशिर्वाद प्राप्त किया।
भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी मे दशहरा पर्व मनाने के लिए काछन देवी पूजा विधान का आयोजन किया गया। राज परिवार के सदस्य, दंतेश्वरी मंदिर के प्रधान पुजारी, राजगुरु और मांझी-मुखिया शोभायात्रा के रूप में काछन गुडी पहुंचे। परम्परानुसार काछन देवी का आव्हान किया गया। एक सप्ताह से व्रत-आराधना कर रही बालिका पीहू दास पर देवी सवार होने के बाद बेल कांटो से बने झूले पर सवार काछन देवी से बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव और माझी-चालकी निर्विघ्न दशहरा पर्व संपन्नता का आशिर्वाद मांगी गई। देवी से निर्विघ्न बस्तर दशहरा पर्व संपन्नता का आशिर्वाद मिलने के बाद काछन देवी और दंतेश्वरी माई कीजयकारे से गूंज उठा। काछन गादीपूजा विधान में बड़ी संख्या मे श्रद्धालु शामिल हुए।
काछिन गुड़ी में काछनगादी पूजा विधान रस्म पूरा होने के बाद शहर के गोलबाजार में रैला देवी के स्वरूप में बालिका गुनगुन ने राज परिवार के सदस्य को निर्विघ्न बस्तर दशहरा पर्व की संपन्नता का आशिर्वाद प्राप्त किया। एक किवदंती के अनुसार रैला देवी बस्तर राजपरिवार की राजकुमारी है। बस्तर की संस्कृति के जानकार रूद्र नारायण पाणिग्राही ने बताया कि काछनगादी का शाब्दिक अर्थ देवी को गादी अर्थात गद्दी आसन प्रदान करना है। काछिन देवी रण की देवी मानी जाती हैं। मान्यता के अनुसार पनका जाति की कुंवारी कन्या पर काछन देवी आरूढ़ होती है।

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