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कांकेर। जिले के दुर्गूकोन्दल विकासखंड के अंतिम छोर पर स्थित ग्राम बड़े पराली में परंपरा, सामाजिक एकजुटता और पूर्वजों की धरोहर को बचाने के लिए ग्रामसभा में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर ग्राम बड़े पराली में धर्मांतरण गतिविधियों के उद्देश्य से आने वाले बाहरी ईसाई धर्म प्रचारकों, पादरियों और पास्टरों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।
ग्रामीणों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों से गांव में लगातार धर्म परिवर्तन के प्रयास किए जा रहे थे, जिसके कारण शांतिपूर्ण माहौल में सामाजिक और सांस्कृतिक मतभेद उत्पन्न होने लगे थे। ग्रामीणों का आरोप है कि जिन लोगों ने धर्म परिवर्तन किया, वे धीरे-धीरे आदिवासी समाज की पारंपरिक पूजा-पद्धतियों, स्थानीय देवी-देवताओं में आस्था और सामुदायिक उत्सवों से दूरी बनाने लगे थे। इससे गांव की सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था और एकता बिखरने की कगार पर पहुंच गई थी। इसी गंभीर विषय पर विचार-विमर्श करने के लिए गांव में एक विशेष ग्रामसभा बुलाई गई, जहां सर्वसम्मति से प्रतिबंध का यह फैसला लिया गया।
इस निर्णय के तुरंत बाद ग्रामीणों ने आज शनिवार को गांव के प्रमुख प्रवेश द्वार पर एक बड़ा सूचना बोर्ड स्थापित कर दिया है, ताकि बाहर से आने वाले लोगों को इस आदेश की स्पष्ट जानकारी मिल सके। ग्रामीणों ने साफ किया है कि उनका यह कदम किसी धर्म या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि अपनी मूल पहचान, सांस्कृतिक विरासत और संवैधानिक अधिकारों के तहत अपनी परंपराओं की रक्षा करने का एक प्रयास है।
इस अवसर पर जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी संस्कृति और सामूहिक एकता से ही है। उन्होंने पूर्वजों द्वारा स्थापित मूल्यों को बचाए रखने के लिए ग्रामीणों की इस जागरूकता की सराहना की। इस ग्रामसभा में ग्राम गायत दुर्जन कुमेटी, पटेल सनऊ उयके, सरपंच प्रतिनिधि मानिक कडियाम सहित सैकड़ों की संख्या में महिला-पुरुष ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में उपस्थित रहे।
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग और कांकेर जिले के कई अन्य गांवों में भी पूर्व में ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। पेसा कानून के तहत मिले अधिकारों का हवाला देते हुए पूर्व में सुकमा, नारायणपुर और बस्तर जिलों के करीब दो दर्जन से अधिक गांवों की ग्राम सभाओं ने अपनी स्थानीय संस्कृति के संरक्षण के लिए बाहरी धर्म प्रचारकों के बिना अनुमति प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव पारित किए हैं। बस्तर के कई संवेदनशील क्षेत्रों में ग्रामीण अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए लगातार इस प्रकार के सामूहिक निर्णय ले रहे हैं।
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