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जगदलपुर। बस्तर दशहरा के समापन के बाद बस्तर राजपरिवार के कमलचंद्र भंजदेव स्वयं को मां दंतेश्वरी का माटी पुजारी बताते के दावे को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं वर्तमान राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के बस्तर दशहरा के दौरान रथारूढ़ होने एवं स्वयं को माटी पुजारी कहने का विरोध आदिवासी समाज से होने लगा है।
बलदेव मौर्य का कहना है कि माटी पुजारी की परंपरा का संबंध बस्तर के ऐतिहासिक और पारंपरिक धार्मिक दायित्वों से है। बलदेव मौर्य ने कहा कि आदिवासियों के रूढ़ी प्रथा के अनुसार रुद्र प्रताप देव माटी आखरी पुजारी थे, और उनके बाद किसी अन्य को इस उपाधि का अधिकार नहीं मिला। उन्होंने यह स्पष्ट करते हुए कहा कि आदिवासियों के रूढ़ी परंपरा के अनुसार राजपरिवार के लमसेना (घरजमाई) के परिजनों को माटी पुजारी का दर्जा नहीं मिल सकता है। यह एक विशिष्ट परंपरा और अलग पहचान से जुड़ा विषय है। हम वर्तमान राजपरिवार के सदस्य के रथारूढ़ होने एवं माटी पुजारी होने के स्वयं के दावे का पुरजोर विरोध करेंगे।
बस्तर राजपरिवार के कमलचंद्र भंजदेव स्वयं को मां दंतेश्वरी का माटी पुजारी बताते हैं, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज के संरक्षक बलदेव मौर्य ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए स्पष्ट शब्दों में असहमति जताते हुए इसका विरोध किया है। बलदेव मौर्य का कहना है कि राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र ने रथ में चढऩे के लिए आवेदन किया है, तो मांझी-चालकी के अलावे गांव में रहने वाले जानकारों से भी चर्चा कर लेना चाहिए।उन्होने कहा कि बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव के बाद किसी को भी रथ में चढऩे का अधिकार नही दिया गया है। क्यो कि प्रवीरचंद्र भंजदेव अंतिम बस्तर के महाराजा थे। उसके बाद किसी भी राजपरिवार को बस्तर महाराजा का दर्जा प्राप्त नही हो सकता, इसीलिए बस्तर दशहरा को परंपरानुसार प्रशासनिक स्तर पर उसी तरह से चलाना चाहिए। यह हमारी विरासत की संस्कृति है, इसकी परंपरा को हमें बनाये रखाना है।
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