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00 किसी पर दोष नहीं लगा रहे, यह कलयुग का प्रभाव है
00 अगर धारा के विपरीत चलोगे तो कष्ट होना स्वाभाविक है
00 मनुष्य शरीर केवल और केवल भगवत प्राप्ति के लिए मिला है
रायपुर। सावन माह बहुत ही पावन और महादेव को पूजने का महीना है। संयोग देखें आज रविवार को एकादशी है और ये भगवान नारायण का पर्व एकादशी है, यह कामना पूर्ण एकादशी है। आज हरि की उपासना का दिन बैठा है और कल सोमवार है महादेव की उपासना का दिन। हमारे यहां एक शब्द बोला जाता है हरि-हर, हर-हरि नहीं बोला जाता। पहले हरि और कल सोमवार को हर क्योंकि महादेव को हर कहते है। रायपुर के मैक कॉलेज ऑडिटोरियम में हरि में हम कथा प्रारंभ कर रहे है और कल हर यानि महादेव के चरणों में पहुंच जायेंगे।
संत शंभूशरण लाटा महराज ने श्रीराम कथा प्रारंभ करते हुए कहा कि कथा क्यों होती है इस पर थोड़ा विचार करने की जरुरत है। हम संसार के चक्र में घूम रहे है, 94 लाख योनियों में। मनुष्य शरीर केवल और केवल भगवत प्राप्ति के लिए मिला है इसलिए हमको भगवत प्राप्ति करनी ही है और करनी है तो कैसी करनी है इन बातों को बताने के लिए कथा होती है। आप जब तक किसी के बारे में जानते नहीं है तब तक उससे दोस्ती नहीं कर सकते है और उसके बारे में जानने से ही हमें प्रीति प्राप्त होती है। इसका अर्थ यह है कि किसी की महिमा आप नहीं जानेंगे तो उसके होने का और उसकी क्या विशेषता है, आप उनसे अनभिज्ञ है, उसके बारे में कोई ज्ञान नहीं है, अच्छा जब जान गए तो उससे प्रीत हो जाती है। आज कल लोग कहते है हम भक्ति करते है लेकिन भक्ति वक्ती कुछ नहीं है, भक्ति करने के लिए क्या चाहिए इसके लिए हमें प्रीति होना बहुत जरुरी है। हम मंदिर में चले जाते है और दान-पुण्य करते हंै तो यह भक्ति नहीं है, आप हाथ में पानी लगा दो थोड़ी देर में वह सूख जाएगा यह भक्ति नहीं है, कुछ लहर आती है और हम झूमते है- नाचते है फिर उसी दिनचर्या में हम डूब जाते है, ये भक्ति नहीं है। दृढ़ता भक्ति में कब आए इसके लिए पहले हमें भगवान को जानना पड़ेगा, जानने से उनके होने का आभास होगा फिर उसमें हमारी प्रीत होगी तब फिर भक्ति हो जाएगी, ये क्रम है और इसको कोई काट नहीं सकता है।
संत श्री ने बताया कि भगवान से भक्ति करने के लिए हमें उनसे अटूट प्रेम की जरुरत होती है लेकिन हमें बड़े दुख के साथ आज कहना पड़ रहा है कि क्योंकि यह कलयुग का प्रभाव है किसी के ऊपर हम दोष नहीं लगा रहे है क्योंकि आज कल कथाएं नहीं तमाशा हो गया है और इसे व्यापार बना लिया गया है। एक बार जब वे निश्चिलानंद सरस्वती जी महाराज से गंगा सागर में मिले तो उन्होंने उनसे कहा कि उनकी अब कथा करने की इच्छा नहीं है क्योकि यह गली गंदी हो गई है और ये रास्ता गंदा हो गया है और जब कोई कहता है सब ऐसे ही है तो छींटे तो हमें भी लगते है, सब ऐसे है तो हम भी तो ऐसे ही है। तब स्वामी जी ने हमसे कहा कि आप कथा करिए और कहा कि ये कलयुग जो चल रहा है इसे भगवान ने ही स्थापित किया है, कलयुग को हमने और आपने नहीं बनाया है, कलयुग को भगवान ने ही बनाया है और उसका काम निर्धारित किया है 4 लाख 32 हजार वर्ष कलयुग रहेगा। यदि आप मौज और मजा करना चाहते है तो कलयुग महाराज के साथ रहिए। आज कल लोगों की धारणा है कि जो पार्टी आ जाए उसके साथ वे झण्डा उठाकर खड़े हो जाते है। क्योंकि ऐसा ही हमें कोलकाता में देखने को मिला जब वहां ममता बैनर्जी की सरकार चले गई और भाजपा सरकार वहां विराजित हो गई। पहले हम लोगों को डर लग रहा था जय श्री राम बोलने में, अब नेता लोग बोलते है।
अगर आप कलयुग के साथ रहोंगे तो मौज करोंगे क्योंकि 50 गाड़ी आपके आगे और पीछे चलेंगी, जिसका शासन है उसका ही बोल बाला होता है। अगर धारा के विपरीत चलोगे तो कष्ट होना स्वाभाविक है। लेकिन कलयुग मार डालेगा, जन्म-जनमांतर बिगड़ जाएंगे और यदि आपने थोड़ा कष्ट सहकर भी कलयुग के विपरीत चले गए और सत्य के मार्ग पर चलोगे तो थोड़ा कष्ट होगा फिर भगवान पकड़ लेंगे फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा।
भगवान शंकर को भोले बाबा कहते है। नारायण को बाबा नहीं कहते है, अगर इसके बाद भी कई बाबा पैदा हो जाएं तो अलग बात है। हनुमान जी महाराज को भी बाबा कहते है क्योंकि सालासार में बाबा की कृपा से वे वहां स्थापित हुए है। जब भी कथा श्रवण करने जाए तो अपने आप में अनुभव करो कि हनुमान जी महाराज हमारे सामने विराजित है और आपको अनुभूति होने लगेगी कि वे आपके सामने खड़े है और आपके संकट मिटने लगेंगे, जो चाहोगे वो वह करीब-करीब होने लगेगा लेकिन इसके लिए तुम्हें हनुमान जी महाराज से प्रीति होना जरुरी है। क्योंकि हनुमान जी महाराज के बिना कहीं पर भी कथा नहीं हो सकती है इसलिए हम कथा शुरु करने से पहले हनुमान जी महाराज को बुलाते है।
वाणी का जीवन में सबसे ज्यादा महत्व है, आज आप देखिए जिनको बोलना नहीं आता है उनका परिवार कभी सुुखी नहीं रहता है, उनका व्यापार बिगडऩे लगता है क्योंकि बोलना एक कला है। कब बोलना चाहिए, कितना बोलना चाहिए, कैसा बोलना चाहिए, ये ज्ञान हो जाए तो आप कभी दूसरे से दुख नहीं पा सकते है। हमारी वाणी ही हमको दुखी करती है। हम तो कथा को लेकर घूमते रहते है। ज्यादा बोलने से अपनी ही हानि होती है और शास्त्र भी हमें ज्यादा बोलने के लिए मना करता है। हम इतने सालों से यहां कथा कर रहे है हम इस दौरान आप लोगों को कभी कोई जादू-मंतर बताएं है या पुडिय़ा वगैरा आपको दिए है कि ऐसा करोगे तो ऐसा हो जाएगा। आज-कल तो टोटको की कथा होती है, इसमें नारियल बांध दो, इसमें ये कर दो, इसमें वो कर दो, ऐसा हो जाएगा, वैसा हो जाएगा, लेकिन होता किसी का नहीं है। सबको पता है लेकिन शायद हो जाए तो इसमें करने में क्या है इसी आशा में लोग आज जी रहे है।
अहम मिटा करके बोलोगे ना तो उसकी बातें लोगों को समझ नहीं आती है, बड़ी-बड़ी भक्ति की बातें करेंगे तो वह एक दिन पकड़ा जरुर जाएगा। जो दूसरों को कष्ट पहुंचाता है वह स्वयं सुखी कैसे रह सकता है। किसी के दिल में आग लगाने से पहले आपने आप को देख लो कि तुम्हारे अंदर आग है की नहीं। वही शीतल करेगा दूसरों को,जो पहले से ही शीतल है।
ताली बजाकर स्वागत करने की परंपरा रायपुर से शुरु हुई
महाराज श्री ने कथा प्रारंभ करते ही कहा कि जब भी वे रायपुर आते है उनका स्वागत ताली बजाकर किया जाता है जिससे वे प्रसन्न और आनंद महसूस करते है और कथा स्थल पर पहुंचते ही ताली बजाने की परंपरा भी यहीं से शुरु हुई है और अब जहां भी वे कथा करने जाते है वहां पर ताली बजवाया जाता है तो रायपुर की याद आ जाती है। अगर कहीं पर भी कथाएं सबसे ज्यादा हुई है तो रायपुर का नंबर पहले नंबर पर आता है क्योंकि यहां सबसे ज्यादा कथाएं होती है।
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