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असंतुष्ट व्यक्ति भगवान का भक्त हो ही नहीं सकता - इन्द्रेश महाराज
0- मुक्ति के लिए तो एक क्षण बहुत है, इसलिए भगवान से मांगो तो भक्ति
0- इन्द्रेश की कथा में आज भी बरसी इन्द्रदेव की कृपा, भक्तों की भीड़ उमड़ी
रायपुर। भागवताचार्य इन्द्रेश जी महाराज ने मुक्ति और भक्ति में अंतर बताते हुए कहा कि जो मृत्यु के लिए भगवान का दर्शन मांगते हैं वह मुक्ति हैं और जो जीते जी भगवान का दर्शन मांगते हैं वह है भक्ति। मुक्ति के लिए तो एक क्षण भी बहुत हैं लेकिन जीवन में जितने भी दिन हों भगवान की भक्ति में लगायें। इसके लिए स्वंय भगवान ने कहा है कि रोज ठाकुर जी का चरणामृत पीने वाला, रोज माथे पर तिलक लगाकर 365 दिन पूजा पाठ प्रभु नाम का जाप करने वाला यदि अपने मृत्यु के समय उनका स्मरण करना भूल भी जाते हैं तो वे स्वंय उनकी स्मृति में आ जाते हैं। यदि आपका मृत्यु सफल नहीं हुआ तो जीवन भर कमाए धन यश वैभव का कोई मतलब नहीं। मृत्यु के बाद यदि ठाकुर जी के दर्शन मिले तो क्या इसलिए प्राण निकल रहे हों तब ही नहीं जीवन भर अंतिम श्वांस तक केवल उन्हे ही पुकारते रहो।
आज भी लगातार हो रही भारी बारिश के बीच लगा कि कथा में कुछ व्यवधान हो सकता है, लेकिन जगन्नाथ प्रभु की कृपा से ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। व्यासपीठ पर आते ही महाराजश्री ने कहा कि इन्द्रेश की कथा में इन्द्रदेव की कृपा बरस रही है, यह रायपुर वालों के लिए सौभाग्य की बात है। आपके उत्साह की चरण सीमा ये है कि आज चौथे दिन मंडी ग्राउंड देवेन्द्रनगर में सर्वाधिक उपस्थिति है। जगन्नाथ प्रभु आज वामन वेष में रहे। किशोरीजी की छठी व नंदोतस्व का प्रसंग भी काफी हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।
असंतुष्ट व्यक्ति भक्त नहीं हो सकता
इन्द्रेश जी महाराज ने बताया कि संसार में सबसे खुश कौन हैं, जिसमें संतुष्टि हो-संतोष है। जो हैं जितना है वहीं पर्याप्त है वहीं अच्छा है। असंतोषी को पाप का भागी बनना पड़ता है। खासकर भक्ति मार्ग पर आने वाले में थोड़ा संतोष हो तो ही सही है। शास्त्रों के मुताबिक असंतुष्ट व्यक्ति ठाकुर जी का भक्त हो ही नहीं सकता। पत्नी जानती है कि पति को किसमें संतोष होगा? गुरु जानते हैं कि श्रोता क्या चाहते या सुनना चाहते हैं। ये भी है कि कुछ जगहों पर संतोष की जगह कल्याण के लिए सोंचना पड़ता है। वेद व्यास जी भागवत की रचना करने के बाद भी संतुष्ट नहीं होते हैं, संदर्भ में बताया कि जब उनको यह ज्ञात कराया जाता है कि उन्होंने परमात्मा के यश ऐश्वर्य का वर्णन तो किया लेकिन निकुंज लीला का वर्णन नहीं किया। ठाकुर जी की वो लीला जिसमें वे थोड़ी सी छांछ के लिए गोपियों के इशारे पर नाचते हैं। यशोदा व किशोरी जी के साथ कैसे लीला करते हैं। इन सब की चिंतन कर जब वेद व्यास भागवत कथा में इसे शामिल किया तब उन्हे संतुष्टि हुई।
भगवान के अवतार का श्रेय किसको जाता है?
वेद व्यास जी ने बताया है कि जो आपको अपने लिए अच्छा नहीं लगता हो, वह किसी और के साथ कभी न करना। यदि ऐसा करते हैं तो पाप लगेगा। असहाय की सहायता करना पुण्य का काम है। भगवान तो एक हैं पर अलग-अलग रुपों में क्यों अवतार लेते हैं? सर्वव्यापकता स्थापित करने के लिए वे अवतार लेते हैं। इन रूपों में भक्तों के प्रेम का रस्वादन ग्रहण करते हैं। इंसान ही क्या जीव जंतुओं को भी मालूम हैं हमारे भी परमात्मा हैं। तभी तो भय है तो निभर्यता है, भय है तो प्रेम भी है। यह अपने अस्तित्व को जानकार नहीं बल्कि ये जानकर कि कोई है हमारे हैं पास है और वो हैं ठाकुरजी। भगवान के अवतार का श्रेय किसको जाता है? इस पर स्वंय कहते हैं कि भक्तों की प्रधानता है इसलिए वे अवतार लेते हैं। उनके ह्दय के भाव व प्रेम से उनका निर्माण होता है,इसलिए जान लें भगवान के अवतार का श्रेय हम सबको जाता है।
खोजने से गुरु नहीं मिलते हैं
इन्द्रेश जी महाराज ने बताया कि किसी के प्रभाव से गुरु नहीं मान लेना,जिनकी भावनाओं से संबंध बने उन्हे गुरु मानना। जिनके केवल शब्द, ज्ञान न लगे बल्कि प्रेम अनुराग से भरा हो। जिनके दर्शन से आपका समाधान हो जाए, फिर भी जिज्ञासा रह जाती है तो उनके उत्तर से परम विश्राम मिल जाए, जिनके वचनामृत से जीवन दर्शन से दूर हटाकर ठाकुर जी से मिला दे वहीं गुरु है। जिनकी चरणों में दृढ़ विश्वास हो वही गुरु है। जिनके सामने आने से सारी इच्छाएं समाप्त हो जाए वही गुरु है।
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