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जीतेगी पार्टी, हारेगी जनता

06 May 2024   110 Views

जीतेगी पार्टी, हारेगी जनता

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लेख - डॉ. अजय कुमार मिश्रा 
18वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव प्रक्रियारत है | देश में अनेकों राजनैतिक पार्टियाँ अपना भविष्य आजमा रही है जबकि मुख्य रूप से दो पार्टी बीजेपी और कांग्रेस सत्ता पाने की दौड़ में है | एक तरफ एनडीए का गठबंधन और दूसरी तरफ इंडिया का गठबंधन अपने अनुभव के आधार पर सत्ता का ख्वाब देख रहा है | देश को मिली आजादी के बाद से अनेकों अप्रत्याशित बड़े बदलाव हुए है पर यह भी जमीनी सच्चाई है की अपेक्षित प्रगति और बदलाव आज तक नहीं हुआ है जिसकी वजह से अस्थिरता और व्यापक अंतर हर तबकें में विद्यमान है | दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव भी विवादों से बच नहीं पाया है | यदि आप कुछ लोगों से और राजनैतिक पार्टियों के प्रवक्ताओं से बात करेगे तो ईवीएम पर भी बड़ा प्रश्न समझ में आयेगा | पर इन सभी बातों के बीच एक महत्वपूर्ण बात जो आजादी के बाद से चली आ रही है उस पर ध्यान शायद ही किसी का हो और इस लोकसभा चुनाव भी यही होगा – “जीतेगी पार्टी, हारेगी जनता” | यह केवल एक वाक्य नहीं है बल्कि अपने देश की वास्तविक सच्चाई भी है यह तभी समझ में आयेगा जब आप निष्पक्ष और गहराई से इसका आकलन करके निष्कर्ष पर पहुँच पाए |
साम्प्रदायिकता 
आप क्या है ? एक इन्सान या फिर एक जाति और धर्म जिसे मानवीय नेतृत्व ने निर्धारित किया है | आजादी के पश्चात् से लेकर अभी तक में साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है | शिक्षित और अशिक्षित सभी श्रेणी के लोगों में इसका जहर अपना अमिट प्रभाव बना चुका है जिसका खामियाजा छुट-पुट रूप में दिख रहा है पर आगामी समय में इसके बड़े दुष्परिणाम को रोकना लगभग असम्भव होगा और यदि आप यह सोच रहे है की आप इससे बचे रह जायेगे तो आप गलत हो क्योंकि इसका खामियाजा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर सभी को कुछ न कुछ उठाना पड़ेगा हां प्राप्त नुकसान का प्रतिशत कम या अधिक हो सकता है और हाँ इस बात के लिए सभी राजनैतिक पार्टियों को बराबर का जिम्मेदार बनाया जा सकता है |
भ्रष्टाचार 
दशकों से अलग अलग नेतृत्वकर्ताओं के द्वारा किया गया प्रॉमिस और बनाये गए नियम एक बार नहीं लगातार विफल सभी को दिखाई दे रहें है | समय और तकनीकी के विकास के साथ भ्रष्टाचार का नया स्वरुप सामने आया है कमी होने के बजाय इसमें वृद्धि हुई है | इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार किसे बनाया जाय यह कहा नहीं जा सकता, क्योंकि अघोषित इस संगठन के कितने हिस्से और लोग है आज तक किसी को नहीं पता | पर यह आपके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हो गया है और यह कहा जा सकता है की यह कुछ एक को छोड़ करके सभी के ब्लड में शामिल हो गया है |
आजादी पर रोक
आजादी के पश्चात से लेकर आज तक सभी सत्ताधारियों ने अपने हित के लिए अनेकों लोगों की आजादी पर रोक लगायी है फिर चाहे जेल में डालना हो या लोगों को पब्लिक में जाने से रोकना या फिर लोगों को एकजुट होने से तोड़ना हो | आखिर आज भी कोई निर्भय होकर कुछ बातों का प्रश्न जान सकता है क्या ? यह कहा जा सकता है नहीं और ऐसे में समय के बढ़ने के साथ साथ इसमें अधिक रोक की सम्भावना दिखाई पड़ रही है |
बेरोजगारी 
जब देश पर शासन करने वाले लोगों को सरकारी बैलेंसशीट लाभ में चाहने लगे तो रोजगार की अपेक्षा करना सबसे बड़ा झूठा ख्वाब देखने जैसा है | अब सरकारें चाहें वो केंद्र की हो या राज्य की सभी रोजगार के मुद्दे को लेकर विफल हो चुकी है | बढ़ती कॉन्ट्रैक्ट प्रणाली, निजीकरण भले ही सरकारी रोजगार ख़त्म कर रहें हो पर इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता की ठेका प्रणाली के विस्तार से आज कार्यरत सभी आदमी मानसिक बीमारी का शिकार है जिसका आकलन भी कोई नहीं करना चाहता | कार्य के घंटे, भुगतान, शिकायत निवारण न होना जैसे अनेकों ऐसी बातें है जो आम आदमी के जीवन को ख़त्म कर रही है |
बढ़ती महंगाई और सीमित होते सामाजिक कार्य 
महंगाई की स्थिति इतनी भयानक है कि आज हर आदमी अपनी जमीनी आवश्यकताओं से समझौता कर रहा है वही दूसरी तरफ आम आदमी के हितों की अनदेखी के साथ साथ सरकारी योजनाओं की घटती संख्या उनमे अवसाद उत्पन्न कर रही है | वैश्विक मानकों के तहत आज देश में शायद ही कोई प्रभावशाली योजना हो जो आम आदमी के जीवन में ऐतिहासिक बदलाव सहयोग करके ला रही हो |
लिखने और कहने को अनेकों मुद्दे और बातें है पर वर्तमान सच्चाई यह है की दशकों पूर्व हम जिन मुद्दों से लड़ रहे थे अब वो मुद्दे अपने नए स्वरुप में सभी के सामने है और समाधान किसी के पास नहीं है जमीनी आवश्यकता रोटी, कपड़ा, मकान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय से दशको पहले हम अपने जीवन में इनकी अनुपस्थिति से लड़ रहे थे अब हम इनकी उपस्थिति के बावजूद इनकी लागत को न उठा पाने से लड़ रहे है | आज प्रत्येक आदमी इन मुद्दों के नए स्वरुप से लड़ रहा है और बिना किसी भेदभाव या पक्षपात के यह आसानी से कहा जा सकता है की “जीतेगी पार्टी, हारेगी जनता” | क्योंकि इन समस्याओं ने इतना विकराल स्वरुप बना लिया है जिसका समाधान करने की शायद ही कोई सोचे | आज भी चुनाव हो रहे है आगे भी होतें रहेगे एक दो नहीं बल्कि ऐसी अनेकों बातें आयेगी और जाएगी जो सभी को आश्चर्यचकित कर देगी पर यह भी अमिट सत्य है की इन अव्यवस्था के लिए सिर्फ एक पार्टी या राजनैतिक दल जिम्मेदार नहीं है बल्कि शासन करने वाला प्रत्येक सख्श जिम्मेदार है जिसने इन मुद्दों से लड़ने के लिए समय पर सही कार्यवाही नहीं की |

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