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** आलेख- संजय दुबे
एक फिल्म आई थी - रोजा। जितनी सशक्त कहानी थी उससे सशक्त इस फिल्म का संगीत था/है। ये हंसी वादियां ये खुला आसमां, आ गए हम कहां....। बर्फ से लदे पहाड़ों में चांदनी रात का नजारा और रूह को छू कर गुजर जाने वाला संगीत! बेमिसाल सम्मिश्रण था। कर्णप्रिय संगीत का सुकून बरसता है, आज भी सुनो तो। ये संगीतकार था ए आर रहमान।दक्षिण फिल्मों के शिल्पकार मणि रत्नम ने इस युवा संगीतकार पर गलत भरोसा नहीं किया था। अगली हिंदी फिल्म बांबे में ए आर रहमान का संगीत सर चढ़ कर बोला था ।तमिल भाषी फिल्मों की भाषाई सीमा होती है।एक क्षेत्र विशेष तक। ये बर्म ए आर रहमान जानते थे। तीन दर्जन हिंदी फिल्मों ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पहचान दी। ऐसा नहीं था कि हिन्दी फिल्मों के ही ए आर रहमान भरोसे थे उनका अपना तरीका है संगीत में वाद्य यंत्रों के बख़ूब उपयोग करने का। "रंगीला" फिल्म के पहले हिंदी फिल्मों में बिना वायलिन के मुखड़ा और अंतरा के बीच के समयावधि को भरना असंभव माना जाता था।" याई रे
याई रे जोर लगा के नाचे रे" ऐसा हिंदी गाना था जिसमें वायलिन का उपयोग नहीं हुआ था। इसे भारतीय संगीत में क्रांति माना गया।
ए आर रहमान ने हिंदी फिल्म संगीत को नई दिशा दी।रंगीला गुरु,रांझणा, जींस, रंग दे बसंती, रॉक स्टार, साथियां, लगान , जोधा अकबर, युवा, दिल से, पुकार जैसी फिल्मों के गाने, उत्कृष्ट गानों के श्रेणी में माने जाते है। स्लम डॉग मिलेनियम फिल्म ने ए आर रहमान को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किया।
ए आर रहमान को कितना सम्मान मिला इसको 6 नेशनल फिल्म अवॉर्ड15 फिल्म फेयर अवर18 दक्षिण फिल्म फेयर अवार्ड सहित गोल्डन ग्लोब एकेडमी अवॉर्ड के अलावा नागरिक अलंकरण पुरस्कार में पद्म भूषण प्रमाणित करता है।
मेरा अपना मानना है कि किसी भी फनकार की जन्मजात जाति न होकर एक ही जाति होनी चाहिए वह है उसके फन की। खिलाड़ी है तो खिलाड़ी जाति का हो, कलाकार हो तो कलाकार की जाति का हो, राजनीतिज्ञ हो तो राजनीति के जाति का हो। अपने फन का फनकार बन कर सेवा करते रहे। दिक्कत तब हो जाती हैं जब ऐसे लोग अपने विस्तार को संकीर्ण रूप दे देते है।
बड़ा उदाहरण है मो अजहरुद्दीन, सबको याद होगा कि बतौर एक क्लासिकल बल्लेबाज और चीते की फुर्ती के बराबर क्षेत्र रक्षण करने के लिए पूरा देश सर आंखों पर बैठा कर रखता था। मैदान के भीतर और बाहर सराहना की स्वर लहरियां गूंजा करती थी। मैच फिक्सिंग में फंस गए तो उन्होंने खिलाड़ी की जाति से खुद को निकाल कर जाति संप्रदाय में फंस गए परिणाम क्या हुआ। वे भारत के इकलौते ऐसे खिलाड़ी है जो 99 टेस्ट में अटक गए। अनेक मुस्लिम स्कॉलर्स जब जातिगत मुद्दे पर केवल एक पक्ष पर बात करते है तो उनको विवाद में पड़ने की विवशता हो जाती है। आमिर खान को देश बड़े सम्मान के साथ कलाकार मानता है।उनकी विविधता स्थापित कलाकारों के समकक्ष है लेकिन देश के माहौल को देख कर डर और देश छोड़ने के बयान से किरकिरी हुई।
पाकिस्तान के भारत की सीमा में किए जा रहे आतंकी हमलों और भारत में उन्हें मिलते पनाह के चलते बहुसंख्यक वर्ग में संदेह बढ़ता है इससे किसी को इंकार नहीं होना चाहिए। कुछ लोगों की संकीर्ण मानसिकता का खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है।
ए आर रहमान पिछले 33 साल से तमिल और हिंदी फिल्मों में सिर्फ और सिर्फ अच्छे संगीतकार होने के कारण बहुमूल्य रहे है ।इतने सालों में उन्होंने कोई शिकायत नहीं किया लेकिन अचानक ही अपने एक संप्रदाय के होने का वास्ता देकर ये कह दिए कि उनको इसका नुकसान हो रहा है और काम नहीं मिल रहा है। अपने ही द्वारा "छाँवा" फिल्म में दिए गए संगीत पर ए आर रहमान की टिप्पणी ने उनको विवाद में डाल दिया है। व्यक्ति,सम्मान पाने के बाद सम्मान को सम्हाल नहीं पा सकता तो फिर उसे मुसीबत में पड़ना ही पड़ता है।ए आर रहमान नए उदाहरण है।
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